# धन की समझ

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- Published: 2026-08-20T21:04:05+05:30
- Author: Astrologer Sidharth

दो छोटी छोटी कहानियां बताता हूं, उससे पता चलेगा कि धन की समझ क्‍या होती है।

पहली कहानी एक ऐसे पात्र की है, जिसके पिता करोड़पति थे, लेकिन बहुत अधिक कंजूस थे।
अपने बेटे को बिजनेस सिखाने की बहुत कोशिश की, लेकिन हमारा जातक कभी व्‍यवसाय करना 
सीखा ही नहीं। बदले में कंजूस पिता ने अपने बेटे को कभी एक नया पैसा भी नहीं दिया। 
केवल रहने के लिए जो हवेली बना रखी थी, उसमें कुछेक कमरे अपने बेटे, बहू और पौत्र पौत्रियों
के लिए दे रखे थे। बाकी खुद कमाओ खाओ। बेटा छोटी मोटी नौकरी करके किसी तरह गुजर बसर
करता, यहां तक कि पुत्रवधु भी कोई छोटी नौकरी करती थी। एक दिन अचानक किसी दुर्घटना 
में पिता का निधन हो गया और हमारे अधेड़ हो चुके जातक के पास आ गए करोड़ों रुपए। उस
बंदे ने अमीर दिखने के सभी साधन अपनाए, हर तरह से पैसे को खर्च किया, पिता की बनाई 
हुई प्रॉपर्टियां बेच बेचकर शाही जिंदगी जी और कुछ वर्ष में फिर से पैसा खत्‍म हो गया।
हवेली संभवत: अब भी है, लेकिन पिता की मृत्‍यु के एक दशक के भीतर लगभग सारा पैसा समाप्‍त
हो गया। धन की समझ नहीं होने से धन मिलने पर भी जातक की स्थिति में स्‍थाई अंतर नहीं
आता, कुछ दिन मौज शौक मनोरंजन हो जाएगा, फिर वही फाके होंगे।

हमारा दूसरा जातक एक वणिक पुत्र है, वह मेरे साथ ही कॉलेज में पढ़ता था। एक सामान्‍य
सी साइकिल पर मेरे साथ ही कॉलेज आता और लौटता था। कभी रास्‍ते में खर्च नहीं करता था।
मैं कुछ अधिक खर्चालु था, लेकिन साथ होने पर वह मुझे भी खर्च नहीं करने देता था। एक
दिन हम साइकिल से कॉलेज से लौट रहे थे कि रास्‍ते में हल्‍की बूंदाबांदी शुरू हो गई।
बादल देखकर लग रहा था कि झमाझम बारिश होगी। वणिक पुत्र ने तुरंत हाथ के इशारे से एक
ऑटो रोका और बोला कि फलां जगह छोड़ना है, करीब पांच किलोमीटर की दूरी थी। ऑटो वाले 
ने बीस रुपए मांगे, तब यह राशि बहुत अधिक थी, दस रुपए में कोई भी छोड़ देता, लेकिन 
वणिक मित्र ने बहस नहीं की, हम दोनों की साइकिल किसी तरह ऑटो में धंसाई और बैठ गए, 
दस मिनट में उसके घर पहुंच गए। ऑटो वाले को पेमेंट किया और दौड़कर छत पर पहुंच गए। 
रिमझिम बारिश का आनन्‍द ले रहे थे और थोड़ी में छत पर ही चाय पकौड़े भी आ गए। जो बंदा
कभी पांच रुपए न खर्च करे, वह बीस रुपए केवल समय पर घर पहुंचने के लिए खर्च कर सकता
है, क्‍योंकि उसे पता है कि आनन्‍द कैसे मिलेगा। पैसा खर्च करने में आनन्‍द नहीं है,
जहां आनन्‍द है, उस अवस्‍था में पहुंचने के लिए जो जरूरी खर्च है, वह करना जरूरी है,
बाकी खर्च गैरजरूरी हैं।

मैं दोनों में से किसी भी जातक की कुण्‍डली तो शेयर नहीं करूंगा, क्‍योंकि यह मेरे 
प्रोफेशनल इथिक्‍स के खिलाफ है, लेकिन ज्‍योतिषीय कोण से दोनों जातकों में आधारभूत 
अंतर कुछ इस तरह हैं कि पहले जातक की कुण्‍डली तृतीयक श्रेणी की कुण्‍डली है, यानी 
लग्‍नेश निर्बल होकर छह, आठ अथवा बारह में है। चंद्रमा कमजोर है, द्वितीय भाव नष्‍ट
है और द्वादश भाव बली है। इस कारण उसे धन की समझ कम और खर्च का उत्‍साह अधिक है।

दूसरे वणिक पुत्र की कुण्‍डली में लग्‍नेश बली है, बली लग्‍नेश उच्‍च का होकर हो सकता
है। लग्‍नेश लग्‍न, द्वितीय, तृतीय, नवम, दशम अथवा एकादश में हो तो जातक की कुण्‍डली
प्रथम श्रेणी की होगी। द्वितीय भाव जो स्‍थाई धन का भाव है मजबूत होगा तो धन की समझ
होगी। ऐसे जातक का चंद्रमा कमजोर हो तो कमाने और खर्च करने, दोनों स्थितियों में तनाव
में रहेगा, अगर चंद्रमा भी अच्‍छी स्थिति हो तो जातक न केवल अच्‍छा कमाता है बल्कि 
आय और व्‍यय दोनों स्थितियों में अपेक्षाकृत स्थिर भी बना रहता है।

**सिद्धार्थ जगन्‍नाथ जोशी**
 **बीकानेर**
