# भक्तामर स्तोत्र (संस्कृत)

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- Published: 2022-02-06T18:14:35+05:30
- Author: Astrologer Sidharth

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भक्तामर – प्रणत – मौलि – मणि -प्रभाणा-
 मुद्योतकं दलित – पाप – तमो – वितानम्। सम्यक्-
प्रणम्य जिन – पाद – युगं युगादा- वालम्बनं भव – जले पततां जनानाम्।। 1॥

य: संस्तुत: सकल – वाङ् मय – तत्त्व-बोधा-
 दुद्भूत-बुद्धि – पटुभि: सुर – लोक – नाथै:।
स्तोत्रैर्जगत्- त्रितय – चित्त – हरैरुदारै:, स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥
2॥

बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित – पाद – पीठ!
 स्तोतुं समुद्यत – मतिर्विगत – त्रपोऽहम्।
बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब- मन्य: क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम् ॥ 3॥

वक्तुं गुणान्गुण -समुद्र ! शशाङ्क-कान्तान्,
 कस्ते क्षम: सुर – गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या।
कल्पान्त -काल – पवनोद्धत- नक्र- चक्रं , को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥ 4॥

सोऽहं तथापि तव भक्ति – वशान्मुनीश!
 कर्तुं स्तवं विगत – शक्ति – रपि प्रवृत्त:। प्रीत्यात्म–
वीर्य – मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम् नाभ्येति किं निज-शिशो: परिपालनार्थम्॥ 5॥

अल्प- श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,
 त्वद्-भक्तिरेव मुखरी-कुरुते बलान्माम् । यत्कोकिल:
किल मधौ मधुरं विरौति, तच्चाम्र -चारु -कलिका-निकरैक -हेतु:॥ 6॥

त्वत्संस्तवेन भव – सन्तति-सन्निबद्धं,
 पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम् । आक्रान्त–
लोक – मलि -नील-मशेष-माशु, सूर्यांशु- भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥ 7॥

मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद, –
 मारभ्यते तनु- धियापि तव प्रभावात् । चेतो हरिष्यति
सतां नलिनी-दलेषु, मुक्ता-फल – द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दु:॥ 8॥

आस्तां तव स्तवन- मस्त-समस्त-दोषं,
 त्वत्सङ्कथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति । दूरे सहस्रकिरण:
कुरुते प्रभैव, पद्माकरेषु जलजानि विकासभाञ्जि ॥ 9॥

नात्यद्-भुतं भुवन – भूषण ! भूूत-नाथ!
 भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त – मभिष्टुवन्त:। तुल्या
भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥ 10॥

दृष्ट्वा भवन्त मनिमेष – विलोकनीयं,
 नान्यत्र – तोष- मुपयाति जनस्य चक्षु:। पीत्वा
पय: शशिकर – द्युति – दुग्ध-सिन्धो:, क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्?॥ 11॥

यै: शान्त-राग-रुचिभि: परमाणुभिस्-त्वं,
 निर्मापितस्- त्रि-भुवनैक – ललाम-भूत ! तावन्त
एव खलु तेऽप्यणव: पृथिव्यां, यत्ते समान- मपरं न हि रूप-मस्ति॥ 12॥

वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि,
 नि:शेष- निर्जित – जगत्त्रितयोपमानम् । बिम्बं
कलङ्क – मलिनं क्व निशाकरस्य, यद्वासरे भवति पाण्डुपलाश-कल्पम्॥13॥

सम्पूर्ण- मण्डल-शशाङ्क – कला-कलाप-
 शुभ्रा गुणास् – त्रि-भुवनं तव लङ्घयन्ति। ये 
संश्रितास् – त्रि-जगदीश्वरनाथ-मेकं, कस्तान् निवारयति सञ्चरतो यथेष्टम्॥ 14॥

चित्रं – किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्ग-नाभिर्-
 नीतं मनागपि मनो न विकार – मार्गम्। कल्पान्त–
काल – मरुता चलिताचलेन, किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित्॥ 15॥

निर्धूम – वर्ति – रपवर्जित – तैल-पूर:,
 कृत्स्नं जगत्त्रय – मिदं प्रकटीकरोषि। गम्यो
न जातु मरुतां चलिताचलानां, दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाश:॥ 16॥

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्य:,
 स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्- जगन्ति। नाम्भोधरोदर –
निरुद्ध – महा- प्रभाव:, सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके॥ 17॥

नित्योदयं दलित – मोह – महान्धकारं,
 गम्यं न राहु – वदनस्य न वारिदानाम्। विभ्राजते
तव मुखाब्ज – मनल्पकान्ति, विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशाङ्क-बिम्बम्॥ 18॥

किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा,
 युष्मन्मुखेन्दु- दलितेषु तम:सु नाथ! निष्पन्न-
शालि-वन-शालिनी जीव-लोके, कार्यं कियज्जल-धरै-र्जल-भार-नमै्र:॥ 19॥

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,
 नैवं तथा हरि -हरादिषु नायकेषु। तेजः स्फ़ुरन्मणिषु
याति यथा महत्त्वं, नैवं तु काच -शकले किरणाकुलेऽपि॥ 20॥

मन्ये वरं हरि- हरादय एव दृष्टा,
 दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति। किं वीक्षितेन
भवता भुवि येन नान्य:, कश्चिन्मनो हरति नाथ ! भवान्तरेऽपि॥ 21॥

स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,
 नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता। सर्वा
दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं, प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशु-जालम् ॥ 22॥

त्वामामनन्ति मुनय: परमं पुमांस-
 मादित्य-वर्ण-ममलं तमस: पुरस्तात्। त्वामेव सम्य –
गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं, नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्था:॥ 23॥

त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,
 ब्रह्माणमीश्वर – मनन्त – मनङ्ग – केतुम्।
योगीश्वरं विदित – योग-मनेक-मेकं, ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्त: ॥ 24॥

बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्,
 त्वं शङ्करोऽसि भुवन-त्रय- शङ्करत्वात् ।
धातासि धीर! शिव-मार्ग विधेर्विधानाद्, व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि॥ 25॥

तुभ्यं नमस् – त्रिभुवनार्ति – हराय नाथ!
 तुभ्यं नम: क्षिति-तलामल -भूषणाय। तुभ्यं
नमस् – त्रिजगत: परमेश्वराय, तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥ 26॥

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्-
 त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश ! दोषै – रुपात्त–
विविधाश्रय-जात-गर्वै:, स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥ 27॥

उच्चै – रशोक- तरु – संश्रितमुन्मयूख –
 माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम्। स्पष्टोल्लसत्-
किरण-मस्त-तमो-वितानं, बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति॥ 28॥

सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे,
 विभ्राजते तव वपु: कनकावदातम्। बिम्बं वियद्-विलस–
दंशुलता-वितानं तुङ्गोदयाद्रि-शिरसीव सहस्र-रश्मे: ॥ 29॥

कुन्दावदात – चल – चामर-चारु-शोभं,
 विभ्राजते तव वपु: कलधौत -कान्तम्। उद्यच्छशाङ्क-
शुचिनिर्झर – वारि -धार- मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥ 30॥

छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्क- कान्त-
 मुच्चै: स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम्। मुक्ता–
फल – प्रकर – जाल-विवृद्ध-शोभं, प्रख्यापयत्-त्रिजगत: परमेश्वरत्वम्॥ 31॥

गम्भीर – तार – रव-पूरित-दिग्विभागस्-
 त्रैलोक्य – लोक -शुभ – सङ्गम -भूति-दक्ष:। 
सद्धर्म -राज – जय – घोषण – घोषक: सन्, खे दुन्दुभि-र्ध्वनति ते यशस: प्रवादी॥ 32॥

मन्दार – सुन्दर – नमेरु – सुपारिजात-
 सन्तानकादि – कुसुमोत्कर – वृष्टि-रुद्धा। गन्धोद–
बिन्दु- शुभ – मन्द – मरुत्प्रपाता, दिव्या दिव: पतति ते वचसां ततिर्वा॥ 33॥

शुम्भत्-प्रभा- वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते,
 लोक – त्रये – द्युतिमतां द्युति-माक्षिपन्ती।
प्रोद्यद्- दिवाकर-निरन्तर – भूरि -संख्या, दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्याम्॥34॥

स्वर्गापवर्ग – गम – मार्ग – विमार्गणेष्ट:,
 सद्धर्म- तत्त्व – कथनैक – पटुस्-त्रिलोक्या:।
दिव्य-ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ-सर्व- भाषास्वभाव-परिणाम-गुणै: प्रयोज्य:॥ 35॥

उन्निद्र – हेम – नव – पङ्कज – पुञ्ज-कान्ती,
 पर्युल्-लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ। पादौ
पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्त:, पद्मानि तत्र विबुधा: परिकल्पयन्ति॥ 36॥

इत्थं यथा तव विभूति- रभूज् – जिनेन्द्र !
 धर्मोपदेशन – विधौ न तथा परस्य। यादृक् –
प्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा, तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि॥ 37॥

श्च्यो-तन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल,
 मत्त- भ्रमद्- भ्रमर – नाद – विवृद्ध-कोपम्। ऐरावताभमिभ–
मुद्धत – मापतन्तं दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥ 38॥

भिन्नेभ – कुम्भ- गल – दुज्ज्वल-शोणिताक्त,
 मुक्ता – फल- प्रकरभूषित – भूमि – भाग:।
बद्ध – क्रम: क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि, नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥ 39॥

कल्पान्त – काल – पवनोद्धत – वह्नि -कल्पं,
 दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल – मुत्स्फुलिङ्गम्।
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख – मापतन्तं, त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥ 40॥

रक्तेक्षणं समद – कोकिल – कण्ठ-नीलम्,
 क्रोधोद्धतं फणिन – मुत्फण – मापतन्तम्। आक्रामति
क्रम – युगेण निरस्त – शङ्कस्- त्वन्नाम- नागदमनी हृदि यस्य पुंस:॥ 41॥

वल्गत् – तुरङ्ग – गज – गर्जित – भीमनाद-
 माजौ बलं बलवता – मपि – भूपतीनाम्। उद्यद्–
दिवाकर – मयूख – शिखापविद्धं त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति॥ 42॥

कुन्ताग्र-भिन्न – गज – शोणित – वारिवाह,
 वेगावतार – तरणातुर – योध – भीमे। युद्धे
जयं विजित – दुर्जय – जेय – पक्षास्- त्वत्पाद-पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते॥ 43॥

अम्भोनिधौ क्षुभित – भीषण – नक्र – चक्र-
 पाठीन – पीठ-भय-दोल्वण – वाडवाग्नौ। रङ्गत्तरङ्ग-
शिखर- स्थित- यान – पात्रास्- त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति ॥ 44॥

उद्भूत – भीषण – जलोदर – भार- भुग्ना:,
 शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशा:। त्वत्पाद-
पङ्कज-रजो – मृत – दिग्ध – देहा, मर्त्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपा:॥ 45॥

आपाद – कण्ठमुरु – शृङ्खल – वेष्टिताङ्गा,
 गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट – जङ्घा:।
त्वन्-नाम-मन्त्र- मनिशं मनुजा: स्मरन्त:, सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥ 46॥

मत्त-द्विपेन्द्र- मृग- राज – दवानलाहि-
 संग्राम-वारिधि-महोदर – बन्ध -नोत्थम्। तस्याशु
नाश – मुपयाति भयं भियेव, यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते॥ 47॥

स्तोत्र – स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्,
 भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्।
धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं, तं मानतुङ्ग-मवशा-समुपैति लक्ष्मी:॥ 48॥

**– आचार्य मानतुंग देव**

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1.झुके हुए भक्त देवो के मुकुट जड़ित मणियों की प्रथा को प्रकाशित करने वाले, पाप रुपी
अंधकार के समुह को नष्ट करने वाले, कर्मयुग के प्रारम्भ में संसार समुन्द्र में डूबते
हुए प्राणियों के लिये आलम्बन भूत जिनेन्द्रदेव के चरण युगल को मन वचन कार्य से प्रणाम
करके (मैं मुनि मानतुंग उनकी स्तुति करुँगा)

2. सम्पूर्णश्रुतज्ञान से उत्पन्न हुई बुद्धि की कुशलता से इन्द्रों के द्वारा तीन 
लोक के मन को हरने वाले, गंभीर स्तोत्रों के द्वारा जिनकी स्तुति की गई है उन आदिनाथ
जिनेन्द्र की निश्चय ही मैं (मानतुंग) भी स्तुति करुँगा

3. देवों के द्वारा पूजित हैं सिंहासन जिनका, ऐसे हे जिनेन्द्र मैं बुद्धि रहित होते
हुए भी निर्लज्ज होकर स्तुति करने के लिये तत्पर हुआ हूँ क्योंकि जल में स्थित चन्द्रमा
के प्रतिबिम्ब को बालक को छोड़कर दूसरा कौन मनुष्य सहसा पकड़ने की इच्छा करेगा? अर्थात्
कोई नहीं

4. हे गुणों के भंडार! आपके चन्द्रमा के समान सुन्दर गुणों को कहने लिये ब्रहस्पति 
के सद्रश भी कौन पुरुष समर्थ है? अर्थात् कोई नहीं| अथवा प्रलयकाल की वायु के द्वारा
प्रचण्ड है मगरमच्छों का समूह जिसमें ऐसे समुद्र को भुजाओं के द्वारा तैरने के लिए 
कौन समर्थ है अर्थात् कोई नहीं

5. हे मुनीश! तथापि-शक्ति रहित होता हुआ भी, मैं- अल्पज्ञ, भक्तिवश, आपकी स्तुति करने
को तैयार हुआ हूँ| हरिणि, अपनी शक्ति का विचार न कर, प्रीतिवश अपने शिशु की रक्षा के
लिये, क्या सिंह के सामने नहीं जाती? अर्थात जाती हैं

6. विद्वानों की हँसी के पात्र, मुझ अल्पज्ञानी को आपकी भक्ति ही बोलने को विवश करती
हैं| बसन्त ऋतु में कोयल जो मधुर शब्द करती है उसमें निश्चय से आम्र कलिका ही एक मात्र
कारण हैं

7. आपकी स्तुति से, प्राणियों के, अनेक जन्मों में बाँधे गये पाप कर्म क्षण भर में 
नष्ट हो जाते हैं जैसे सम्पूर्ण लोक में व्याप्त रात्री का अंधकार सूर्य की किरणों 
से क्षणभर में छिन्न भिन्न हो जाता है|

8. हे स्वामिन्! ऐसा मानकर मुझ मन्दबुद्धि के द्वारा भी आपका यह स्तवन प्रारम्भ किया
जाता है, जो आपके प्रभाव से सज्जनों के चित्त को हरेगा| निश्चय से पानी की बूँद कमलिनी
के पत्तों पर मोती के समान शोभा को प्राप्त करती हैं|

9. सम्पूर्ण दोषों से रहित आपका स्तवन तो दूर, आपकी पवित्र कथा भी प्राणियों के पापों
का नाश कर देती है| जैसे, सूर्य तो दूर, उसकी प्रभा ही सरोवर में कमलों को विकसित कर
देती है|

10. हे जगत् के भूषण! हे प्राणियों के नाथ! सत्यगुणों के द्वारा आपकी स्तुति करने वाले
पुरुष पृथ्वी पर यदि आपके समान हो जाते हैं तो इसमें अधिक आश्चर्य नहीं है| क्योंकि
उस स्वामी से क्या प्रयोजन, जो इस लोक में अपने अधीन पुरुष को सम्पत्ति के द्वारा अपने
समान नहीं कर लेता |

11. हे अभिमेष दर्शनीय प्रभो! आपके दर्शन के पश्चात् मनुष्यों के नेत्र अन्यत्र सन्तोष
को प्राप्त नहीं होते| चन्द्रकीर्ति के समान निर्मल क्षीरसमुद्र के जल को पीकर कौन 
पुरुष समुद्र के खारे पानी को पीना चाहेगा? अर्थात् कोई नहीं |

12. हे त्रिभुवन के एकमात्र आभुषण जिनेन्द्रदेव! जिन रागरहित सुन्दर परमाणुओं के द्वारा
आपकी रचना हुई वे परमाणु पृथ्वी पर निश्चय से उतने ही थे क्योंकि आपके समान दूसरा रूप
नहीं है |

13. हे प्रभो! सम्पूर्ण रुप से तीनों जगत् की उपमाओं का विजेता, देव मनुष्य तथा धरणेन्द्र
के नेत्रों को हरने वाला कहां आपका मुख? और कलंक से मलिन, चन्द्रमा का वह मण्डल कहां?
जो दिन में पलाश (ढाक) के पत्ते के समान फीका पड़ जाता |

14. पूर्ण चन्द्र की कलाओं के समान उज्ज्वल आपके गुण, तीनों लोको में व्याप्त हैं क्योंकि
जो अद्वितीय त्रिजगत् के भी नाथ के आश्रित हैं उन्हें इच्छानुसार घुमते हुए कौन रोक
सकता हैं? कोई नहीं |

15. यदि आपका मन देवागंनाओं के द्वारा किंचित् भी विक्रति को प्राप्त नहीं कराया जा
सका, तो इस विषय में आश्चर्य ही क्या है? पर्वतों को हिला देने वाली प्रलयकाल की पवन
के द्वारा क्या कभी मेरु का शिखर हिल सका है? नहीं |

16. हे स्वामिन्! आप धूम तथा बाती से रहित, तेल के प्रवाह के बिना भी इस सम्पूर्ण लोक
को प्रकट करने वाले अपूर्व जगत् प्रकाशक दीपक हैं जिसे पर्वतों को हिला देने वाली वायु
भी कभी बुझा नहीं सकती |

17. हे मुनीन्द्र! आप न तो कभी अस्त होते हैं न ही राहु के द्वारा ग्रसे जाते हैं और
न आपका महान तेज मेघ से तिरोहित होता है आप एक साथ तीनों लोकों को शीघ्र ही प्रकाशित
कर देते हैं अतः आप सूर्य से भी अधिक महिमावन्त हैं |

18. हमेशा उदित रहने वाला, मोहरुपी अंधकार को नष्ट करने वाला जिसे न तो राहु ग्रस सकता
है, न ही मेघ आच्छादित कर सकते हैं, अत्यधिक कान्तिमान, जगत को प्रकाशित करने वाला 
आपका मुखकमल रुप अपूर्व चन्द्रमण्डल शोभित होता है |

19. हे स्वामिन्! जब अंधकार आपके मुख रुपी चन्द्रमा के द्वारा नष्ट हो जाता है तो रात्रि
में चन्द्रमा से एवं दिन में सूर्य से क्या प्रयोजन? पके हुए धान्य के खेतों से शोभायमान
धरती तल पर पानी के भार से झुके हुए मेघों से फिर क्या प्रयोजन |

20. अवकाश को प्राप्त ज्ञान जिस प्रकार आप में शोभित होता है वैसा विष्णु महेश आदि 
देवों में नहीं | कान्तिमान मणियों में, तेज जैसे महत्व को प्राप्त होता है वैसे किरणों
से व्याप्त भी काँच के टुकड़े में नहीं होता |

21. हे स्वामिन्| देखे गये विष्णु महादेव ही मैं उत्तम मानता हूँ, जिन्हें देख लेने
पर मन आपमें सन्तोष को प्राप्त करता है| किन्तु आपको देखने से क्या लाभ? जिससे कि प्रथ्वी
पर कोई दूसरा देव जन्मान्तर में भी चित्त को नहीं हर पाता |

22. सैकड़ों स्त्रियाँ सैकड़ों पुत्रों को जन्म देती हैं, परन्तु आप जैसे पुत्र को 
दूसरी माँ उत्पन्न नहीं कर सकी| नक्षत्रों को सभी दिशायें धारण करती हैं परन्तु कान्तिमान्
किरण समूह से युक्त सूर्य को पूर्व दिशा ही जन्म देती हैं |

23. हे मुनीन्द्र! तपस्वीजन आपको सूर्य की तरह तेजस्वी निर्मल और मोहान्धकार से परे
रहने वाले परम पुरुष मानते हैं | वे आपको ही अच्छी तरह से प्राप्त कर म्रत्यु को जीतते
हैं | इसके सिवाय मोक्षपद का दूसरा अच्छा रास्ता नहीं है |

24. सज्जन पुरुष आपको शाश्वत, विभु, अचिन्त्य, असंख्य, आद्य, ब्रह्मा, ईश्वर, अनन्त,
अनंगकेतु, योगीश्वर, विदितयोग, अनेक, एक ज्ञानस्वरुप और अमल कहते हैं |

25. देव अथवा विद्वानों के द्वारा पूजित ज्ञान वाले होने से आप ही बुद्ध हैं| तीनों
लोकों में शान्ति करने के कारण आप ही शंकर हैं| हे धीर! मोक्षमार्ग की विधि के करने
वाले होने से आप ही ब्रह्मा हैं| और हे स्वामिन्! आप ही स्पष्ट रुप से मनुष्यों में
उत्तम अथवा नारायण हैं |

26. हे स्वामिन्! तीनों लोकों के दुःख को हरने वाले आपको नमस्कार हो, प्रथ्वीतल के 
निर्मल आभुषण स्वरुप आपको नमस्कार हो, तीनों जगत् के परमेश्वर आपको नमस्कार हो और संसार
समुन्द्र को सुखा देने वाले आपको नमस्कार हो|

27. हे मुनीश! अन्यत्र स्थान न मिलने के कारण समस्त गुणों ने यदि आपका आश्रय लिया हो
तो तथा अन्यत्र अनेक आधारों को प्राप्त होने से अहंकार को प्राप्त दोषों ने कभी स्वप्न
में भी आपको न देखा हो तो इसमें क्या आश्चर्य?

28. ऊँचे अशोक वृक्ष के नीचे स्थित, उन्नत किरणों वाला, आपका उज्ज्वल रुप जो स्पष्ट
रुप से शोभायमान किरणों से युक्त है, अंधकार समूह के नाशक, मेघों के निकट स्थित सूर्य
बिम्ब की तरह अत्यन्त शोभित होता है |

29. मणियों की किरण-ज्योति से सुशोभित सिंहासन पर, आपका सुवर्ण कि तरह उज्ज्वल शरीर,
उदयाचल के उच्च शिखर पर आकाश में शोभित, किरण रुप लताओं के समूह वाले सूर्य मण्डल की
तरह शोभायमान हो रहा है|

30. कुन्द के पुष्प के समान धवल चँवरों के द्वारा सुन्दर है शोभा जिसकी, ऐसा आपका स्वर्ण
के समान सुन्दर शरीर, सुमेरुपर्वत, जिस पर चन्द्रमा के समान उज्ज्वल झरने के जल की 
धारा बह रही है, के स्वर्ण निर्मित ऊँचे तट की तरह शोभायमान हो रहा है|

31. चन्द्रमा के समान सुन्दर, सूर्य की किरणों के सन्ताप को रोकने वाले, तथा मोतियों
के समूहों से बढ़ती हुई शोभा को धारण करने वाले, आपके ऊपर स्थित तीन छत्र, मानो आपके
तीन लोक के स्वामित्व को प्रकट करते हुए शोभित हो रहे हैं|

32.गम्भीर और उच्च शब्द से दिशाओं को गुञ्जायमान करने वाला, तीन लोक के जीवों को शुभ
विभूति प्राप्त कराने में समर्थ और समीचीन जैन धर्म के स्वामी की जय घोषणा करने वाला
दुन्दुभि वाद्य आपके यश का गान करता हुआ आकाश में शब्द करता है|

33. सुगंधित जल बिन्दुओं और मन्द सुगन्धित वायु के साथ गिरने वाले श्रेष्ठ मनोहर मन्दार,
सुन्दर, नमेरु, पारिजात, सन्तानक आदि कल्पवृक्षों के पुष्पों की वर्षा आपके वचनों की
पंक्तियों की तरह आकाश से होती है|

34. हे प्रभो! तीनों लोकों के कान्तिमान पदार्थों की प्रभा को तिरस्कृत करती हुई आपके
मनोहर भामण्डल की विशाल कान्ति एक साथ उगते हुए अनेक सूर्यों की कान्ति से युक्त होकर
भी चन्द्रमा से शोभित रात्रि को भी जीत रही है|

35. आपकी दिव्यध्वनि स्वर्ग और मोक्षमार्ग की खोज में साधक, तीन लोक के जीवों को समीचीन
धर्म का कथन करने में समर्थ, स्पष्ट अर्थ वाली, समस्त भाषाओं में परिवर्तित करने वाले
स्वाभाविक गुण से सहित होती है|

36. पुष्पित नव स्वर्ण कमलों के समान शोभायमान नखों की किरण प्रभा से सुन्दर आपके चरण
जहाँ पड़ते हैं वहाँ देव गण स्वर्ण कमल रच देते हैं|

37. हे जिनेन्द्र! इस प्रकार धर्मोपदेश के कार्य में जैसा आपका ऐश्वर्य था वैसा अन्य
किसी का नही हुआ| अंधकार को नष्ट करने वाली जैसी प्रभा सूर्य की होती है वैसी अन्य 
प्रकाशमान भी ग्रहों की कैसे हो सकती है?

38. आपके आश्रित मनुष्यों को, झरते हुए मद जल से जिसके गण्डस्थल मलीन, कलुषित तथा चंचल
हो रहे है और उन पर उन्मत्त होकर मंडराते हुए काले रंग के भौरे अपने गुजंन से क्रोध
बढा़ रहे हों ऐसे ऐरावत की तरह उद्दण्ड, सामने आते हुए हाथी को देखकर भी भय नहीं होता
|

39. सिंह, जिसने हाथी का गण्डस्थल विदीर्ण कर, गिरते हुए उज्ज्वल तथा रक्तमिश्रित गजमुक्ताओं
से पृथ्वी तल को विभूषित कर दिया है तथा जो छलांग मारने के लिये तैयार है वह भी अपने
पैरों के पास आये हुए ऐसे पुरुष पर आक्रमण नहीं करता जिसने आपके चरण युगल रुप पर्वत
का आश्रय ले रखा है|

40. आपके नाम यशोगानरुपी जल, प्रलयकाल की वायु से उद्धत, प्रचण्ड अग्नि के समान प्रज्वलित,
उज्ज्वल चिनगारियों से युक्त, संसार को भक्षण करने की इच्छा रखने वाले की तरह सामने
आती हुई वन की अग्नि को पूर्ण रुप से बुझा देता है|

41. जिस पुरुष के ह्रदय में नामरुपी-नागदौन नामक औषध मौजूद है, वह पुरुष लाल लाल आँखो
वाले, मदयुक्त कोयल के कण्ठ की तरह काले, क्रोध से उद्धत और ऊपर को फण उठाये हुए, सामने
आते हुए सर्प को निश्शंक होकर दोनों पैरो से लाँघ जाता है|

42. आपके यशोगान से युद्धक्षेत्र में उछलते हुए घोडे़ और हाथियों की गर्जना से उत्पन
भयंकर कोलाहल से युक्त पराक्रमी राजाओं की भी सेना, उगते हुए सूर्य किरणों की शिखा 
से वेधे गये अंधकार की तरह शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो जाती है|

43. हे भगवन् आपके चरण कमलरुप वन का सहारा लेने वाले पुरुष, भालों की नोकों से छेद 
गये हाथियों के रक्त रुप जल प्रवाह में पडे़ हुए, तथा उसे तैरने के लिये आतुर हुए योद्धाओं
से भयानक युद्ध में, दुर्जय शत्रु पक्ष को भी जीत लेते हैं|

44. क्षोभ को प्राप्त भयंकर मगरमच्छों के समूह और मछलियों के द्वारा भयभीत करने वाले
दावानल से युक्त समुद्र में विकराल लहरों के शिखर पर स्थित है जहाज जिनका, ऐसे मनुष्य,
आपके स्मरण मात्र से भय छोड़कर पार हो जाते हैं|

45. उत्पन्न हुए भीषण जलोदर रोग के भार से झुके हुए, शोभनीय अवस्था को प्राप्त और नहीं
रही है जीवन की आशा जिनके, ऐसे मनुष्य आपके चरण कमलों की रज रुप अम्रत से लिप्त शरीर
होते हुए कामदेव के समान रुप वाले हो जाते हैं|

46. जिनका शरीर पैर से लेकर कण्ठ पर्यन्त बडी़-बडी़ सांकलों से जकडा़ हुआ है और विकट
सघन बेड़ियों से जिनकी जंघायें अत्यन्त छिल गईं हैं ऐसे मनुष्य निरन्तर आपके नाममंत्र
को स्मरण करते हुए शीघ्र ही बन्धन मुक्त हो जाते है|

47. जो बुद्धिमान मनुष्य आपके इस स्तवन को पढ़ता है उसका मत्त हाथी, सिंह, दवानल, युद्ध,
समुद्र जलोदर रोग और बन्धन आदि से उत्पन्न भय मानो डरकर शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो
जाता है|

48. हे जिनेन्द्र देव! इस जगत् में जो लोग मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक (ओज, प्रसाद, माधुर्य
आदि) गुणों से रची गई नाना अक्षर रुप, रंग बिरंगे फूलों से युक्त आपकी स्तुति रुप माला
को कंठाग्र करता है उस उन्नत सम्मान वाले पुरुष को अथवा आचार्य मानतुंग को स्वर्ग मोक्षादि
की विभूति अवश्य प्राप्त होती है|
