# मध्‍य पाराशरीय सूत्र Madhya Parashari sutra

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- Published: 2026-05-14T13:57:20+05:30
- Author: Astrologer Sidharth

### **प्रथम परिच्‍छेद**

 1.  पाराशर मुनि को नमस्‍कार कर उनके होराशास्‍त्र का निरीक्षण कर मैं नक्षत्र दशा मार्ग
     बतलाता हूं।
 2.  सूर्य आदि ग्रह तथा मेष आदि द्वादश राशियां सदैव लोकहित में कार्य करते हैं।
 3.  बारह भावों में से लग्‍न और नवम स्‍थान को धन तथा चतुर्थ तथा दशम स्‍थान को सुख स्‍थान
     कहा जाता है।
 4.  अष्‍टम स्‍थान आयु का स्‍थान तथा द्वादश स्‍थान मारक स्‍थान माना जाता है।
 5.  मारक स्‍थान के अधिपति होकर सूर्य और चंद्रमा मारक नहीं होते, शेष ग्रह मारक होते
     हैं। छठे और आठवें भाव के अधिपति तथा राहु व केतु भी मारक होते हैं।
 6.  चंद्रकांत राशि का अधिपति खरद्रेष्‍काण एवं उससे द्वादश का अधिपति वैनाशिकाधिप होता
     है।
 7.  विपत्त, प्रत्‍यरि तथा वधताधीश ग्रहों को भी मारक ग्रह समझना चाहिए।
 8.  ग्रहों के स्‍थान, भेद और दृष्टिसंबंध से अन्‍य राजयोग बताए जा रहे हैं।
 9.  सर्वप्रथम जन्‍मकालीन लग्‍न का निर्णय कर तत्‍कालीन ग्रहसंचार का गणित स्‍पष्‍ट करना
     आवश्‍यक है।
 10. जन्‍मपत्रिका देखकर सर्वप्रथम आयु का विचार करना चाहिए। इसके बाद अन्‍य लक्षणों का‍
     विचार करना चाहिए। आयु ही नहीं है तो लक्षणज्ञान का प्रयास व्‍यर्थ होगा। आयु नहीं
     है तो राजयोग का प्रायोजन भी नहीं है।
 11. इसके पश्चात बारह भावों की स्‍थापना कर उनकी संज्ञाओं को समझना चाहिए। सामान्‍य तौर
     पर तृतीय, षष्‍ठ, अष्‍टम, एकादश और द्वादश भाव को विनाशकारी माना गया है।
 12. केन्‍द्र तथा त्रिकोण यानी लग्‍न, चतुर्थ, सप्‍तम, दशम तथा त्रिकोण यानी पंचम और 
     नवम भाव में अशुभ राशियां भी शुभफलदायक होती हैं।
 13. मुनियों के अनुभव में चतुर्थ और दशम केन्‍द्र अन्‍य केन्‍द्रों की तुलना में अधिक
     बली कहे गए हैं।
 14. पूर्व के अनुसार योगायोगों को देखा जाएगा।
 15. सभी ग्रहों की सप्‍तम पर दृष्टि होती है, गुरु की पंचम-नवम, मंगल की चतुर्थ अष्‍टम
     तथा शनि की तृतीय दशम अतिरिक्‍त दृष्टियां होती हैं।
 16. नवम तथा पंचम स्‍थान को लक्ष्‍मी स्‍थान तथा लग्‍न, चतुर्थ, सप्‍तम और दशम स्‍थान
     केन्‍द्र स्‍थान हैं। इन दोनों का संबंध होने पर जातक चक्रवर्ती राजा होता है।
 17. नवम भाव का अधिपति पंचम भाव में हो अथवा नवमेश वृहस्‍पति हो अथवा नवमेश और गुरु का
     संबंध हो तो जातक अन्‍य राज्‍यों का उपभोग करता है।
 18. किसी भी जातक की पत्रिका में पंचमेश और वृहस्‍पति एकत्र हों अथवा परस्‍पर समसप्‍तम
     हो तो राजवंश में उत्‍पन्‍न बालक ही राजा होता है।
 19. चतुर्थेश दशम में एवं दशमेश चतुर्थ में हो और पंचम नवम के अधिपति से दृ‍ष्‍ट हो तो
     जातक बहुतराज्‍यभोगी होता है।
 20. लग्‍न पंचम नवम और दशम अधिपति ग्रहों में से कोई भी नवमेश से युक्‍त हो तो राजकुलोत्‍पन्‍न
     बालक हाथी घोड़े से युक्‍त होकर अपने प्रताप से देश विदेश में ख्‍यात होता है।
 21. सुखेश और दशमेश पंचमेश से युक्‍त होकर नवमेश से दृष्‍ट हो तो बालक बहुराज्‍य सुखभाग
     होता है।
 22. धर्मेश और लग्‍नेश से युक्‍त पंचमेश यदि लग्‍न, चतुर्थ या दशम में हो तो राजवंशोद्भव
     जातक ही राजगद्दी का उत्‍तराधिकारी होता है।

### **द्वितीय परिच्‍छेद**

 1.  पाराशर कह रहे हैं कि ग्रहों के स्‍थान और दृष्टि संबंध से धन योग बता रहा हूं।
 2.  नवमेश और पंचमेश से युत या दृष्‍ट कोई भी शुभ ग्रह फलदायी होता है। छठे, आठवें, बारहवें
     भाव के अधिपति तथा मारकेश से युक्‍त या दृष्‍ट ग्रह से शुभफल की आशा नहीं की जा सकती।
 3.  अपने स्‍थान वश के योगों और पाप शुभ ग्रहों की स्थिति वश उनके परस्‍पर संबंधों से
     धनप्राप्‍तिकारक योगों का विचार करना चाहिए।
 4.  लग्‍न से नवम स्‍थान में धनु या मीन राशि हो तथा गुरु, शुक्र अथवा पंचमेश से युक्‍त
     हो तो जातक बहुत धनी होता है।
 5.  पंचम स्‍थान में मिथुन या कन्‍या राशि में बुध हो, साथ ही एकादश भाव में चंद्रमा 
     और मंगल की युति हो तो जातक विशेष धनी होता है।
 6.  पंचम भाव में वृष या तुला राशि में बुध और शुक्र हो तथा एकादश में शनि हो तो जातक
     विशेष धनी होता है।
 7.  मेष लग्‍न से पंचम सिंह राशिगत सूर्य और गुरु एकादश भाव में हो तो जातक बहुत धनी 
     होता है।
 8.  लाभेश से युक्‍त पंचम में स्‍वगृही शनि होने से जातक विशेष धन संपन्‍न होता है।
 9.  स्‍वगृही गुरु पंचम में और लाभ भाव चंद्र बुध युक्‍त हो तो जातक बहुत धनी होता है।
 10. स्‍वराशिगत चंद्रमा पंचम में, और लाभ भावगत मंगल से जातक सुंदर धनी होता है।
 11. स्‍वराशिगत लग्‍नस्‍थ सूर्य पर यदि मंगल गुरु की दृष्टि हो तो जातक करोड़पति होता
     है।
 12. कर्क राशिगत चंद्रमा लग्‍नस्‍थ हो और गुरु मंगल से युत या दृष्‍ट हो तो जातक करोड़पति
     होता है।
 13. स्‍वराशिगत लग्‍नस्‍थ मंगल, चंद्र गुरु से युत अथवा दृष्‍ट हो तो बहुत धनी होता है।
 14. मिथुन या कन्‍या राशि स्थित लग्‍नगत बुध, यदि गुरु चंद्र से दृष्‍ट या युत हो तो 
     भी विशेष धनी होता है।
 15. तुला या वृषभ राशिगत शुक्र पर शनि बुध का योग या दृष्टि हो तो भी विशेष धनी होता 
     है।
 16. मकर या कुंभ राशि स्थित लग्‍नगत शनि और बुध शुक्र से युत या दृष्‍ट हो तो जातक बड़ा
     धनी होता है।

### **तृतीय परिच्‍छेद**

 1.  दुख के कारण दरिद्र योग कहे जा रहे हैं। जो पाप ग्रहों के संबंध से होते हैं।
 2.  पंचम व नवम अधिपति से युत और दृष्‍ट संबंध से रहित कोई भी ग्रह बहुत दुखद होता है।
     षष्‍ठ, अष्‍टम और द्वादश भावेशों से युक्‍त अथवा दृष्‍ट अथवा मारकेश ग्रह से युक्‍त
     दृष्‍ट ग्रह से मृत्‍यु या मृत्‍युतुल्‍य कष्‍ट होता है।
 3.  लग्‍नेश बारहवें और द्वादशेष लग्‍नगत हो, मारकेश से युत दृष्‍ट हो तो मृत्‍यु योग
     होता है।
 4.  मारकेश से दृष्‍ट लग्‍नेश शत्रु घर में हो अथवा अस्‍तंगत षष्‍ठेश लग्‍नस्‍थ हो तो
     मनुष्‍य निर्धन होता है।
 5.  केतु से युत लग्‍नगत चंद्र हो, अष्‍टनस्‍थ लग्‍नेश को मारकेश देखता हो निर्धन होता
     है।
 6.  पापयुक्‍त षष्‍ठ अथवा अष्‍टम मंगल लग्‍नेश पर मारकेश की दृष्टि और योग से राजवंशोत्‍पन्‍न
     जातक भी निर्धन होता है।
 7.  सूर्य और व्‍ययेश से युत दृष्‍ट लग्‍नेश पर पापदृष्टि हो, लग्‍नेश शनियुत हो, शुभग्रहों
     से युत दृष्‍ट न हो तो ऐसा योग, परिपूर्ण दरिद्रता का सूचक होता है।
 8.  पंचमेश और नवमेश छठे या दशम में हो तो मारकेश से दृष्‍ट हो तो जातक निर्धन होता है।
 9.  जिस भाव का स्‍वामी छठे आठवें और बारहवें भाव में हो एवं छठे, आठवें तथा बारहवें 
     भाव के स्‍वामी जिस भाव में पापग्रह युत या दृष्‍ट हो, उस भाव के नाश के साथ जातक
     चंचल और दुखी होता है।
 10. जन्‍मकालीन लग्‍न नवांशेष यदि मारकेश युत हो, या मारक स्‍थानगत हो तो जातक निर्धन
     होता है।
 11. नवमेश व दशमेश न होकर, मारकेश से युत दृष्‍ट व पापग्रह से, दरिद्र योग ही होता है।
 12. यदि लग्‍नेश और नवांशेष षष्‍ठ, अष्‍टम द्वादश भावगत हों मारकेश से युत दृष्‍ट हो 
     तो जातक निर्धन होता है।
 13. धनभावस्‍थ चंद्र और मंगल धन नाश कारक होते हैं। यदि धनभावगत चंद्र मंगल पर बुध की
     दृष्टि हो तो जातक बहुत धनी होता है।
 14. धन भावगत रवि पर भी शनि की दृष्टि से धन नाश होता है। यदि धन भावगत सूर्य पर शनि 
     की दृष्टि नहीं है तो जातक धनी होता है।
 15. धनभावगत सभी शुभ ग्रहों से जातक धनी होता है, तथा धनभावगत गुरु पर यदि बुध की दृष्टि
     हो तो जातक निर्धन की होता है।
 16. धन भावगत बुध पर चंद्रम की दृष्टि से सर्वधन का नाश हो जाता है। ग्रहों के बलाबल 
     के विचार से आधार से उक्‍त धनी या निर्धनी जातक योगों का फलादेश करना चाहिए।

### **चतुर्थ परिच्‍छेद**

 1.  ज्‍योतिष शास्‍त्र महासागर का सारभूत, जो तत्‍वजातक की सुखप्रद दशा है, उसका वर्णन
     करता हूं।
 2.  जैमिनी ऋषि प्रणीत जैमिनी सूत्र में अकारादि हकार वर्णों से अंकसंख्‍या का जैसा मापदण्‍ड
     माना गया है, उसी प्रकार इस मध्‍यपाराशरी रचियता विद्वान ज्‍योतिषी ने भी यहां पर
     अक्षरों से अंकों के बोधक वर्णों का प्रयोग किया है। जैमिनी सूत्र की टीका में वृद्ध
     कारिका निम्‍न है। क्रम इस प्रकार है । क से झ तक संख्या = 9, अर्थात् क = १, ख =
     २, ग = ३, घ = ४, ङ = ५, च = ६, छ = ७, ज = ८, झ = ९ तथा ट = १, ठ = २, ड = ३, ढ 
     = ४, ण = ५, त = ६, थ = ७, द = ८, ध = ९, न = ०, तथा प = १, फ = २, ब = ३, भ = ४,
     म = ५, तथा य = १, र = २, ल = ३, व = ४, श = ५, ष = ६, स = ७, ह = ८, अ-आ-इ सभी ०
     एवं न व ञ = ० इस प्रकार की कल्पना ध्यान में रखते हुए इस श्लोक में हलन्त व्यञ्जन
     और स्वर को शून्य समझते हुए— तनु = ६ वर्ष = सू०। नित्य : १० = चं०, न = ०, त = १“
     वामगतिकाः अङ्काः” सना = ७ = मं, दे या = १८ रा० तया = १६ = वृ०, धान्या = १९ = शनि,
     सटा = १७ = बुध, सना = ७ = केतु न० = र, २ नर = २० = शुक्र इस प्रकार उक्त क्रम से
     सूर्यादिक ग्रहों की दशा के वर्षमान बताये गये हैं। सू० चं० मं० बु० बृ० शु० श० रा०
     के इस क्रम में सू०, चं०, मं० रा० बृ० श०, बु०, के० और शुक्र यह क्रम कैसे माना गया
     होगा?
 3.  अपनी दशा के वर्षमान को तीन से गुणा कर उस दशा में जिस ग्रह की अंतरदशा जाननी है 
     उसकी अंतर्दशा से गुणा कर गुणनफल में 30 का भाग देने मासादिक लब्धि। उस ग्रह की अन्तर्दशा
     होती हैं। जैसे सूर्य में सूर्यान्तर समय ज्ञात करना है, अतः सूर्य वर्ष १=६x३=१८,
     १८x६=१०८= दिन अर्थात् ० वर्ष ३ मास और १८ दिन सूर्य में सूर्य की अन्तर्दशा का मान
     होता है। एवं चन्द्र में यदि शुक्र का अन्तर ज्ञात करना है तो १०x३=३०, ३०x१०=३००
     दिन = १० मास = ० वर्ष १० महीना और ० शून्य दिन इसी प्रकार सर्वत्र समझिए।
 4.  पूर्व नियम से दिनात्मक अन्तर्दशा समय निकाल कर पुनः इसे अपेक्षित ग्रह की महादशा
     वर्ष संख्या से गुणितकर गुणन फल में ४ का भाग देने से लब्धि में पुनः ३० का भाग देने
     से दिनादि अन्तर में अन्तर्दशा मान होता है।
 5.  यथा सूर्य में सूर्यान्तर दशा = १०८ दिन x६/१२० = ० वर्ष ० मास ५ दिन २४ घटी इसी 
     प्रकार यह सूर्य दशा में सूर्यान्तर में सूर्य का ही प्रत्यन्तर होगा। १०८x१०/१२०
     = ०|०|९|० एवं सर्वत्र समझिए।
 6.  इस आधार से ज्योतिर्विद समाज से जातकों के शुभाशुभ फल विचार या आयु का भी निर्णय 
     किया गया है।
 7.  दैवज्ञवर्यो ने पञ्चमेश की दशा में नवमेश ग्रह की अन्तर्दशा का समय सर्वोत्तम कहा
     हैं।
 8.  उदार विचार धारा के दैवज्ञों ने, पञ्चमेश युक्त नवमेश की दशा, तथा पञ्चमेश ग्रह से
     युक्त चतुर्थेश ग्रह की दशादि समयों में मानव की भाग्यवृद्धि कही हैं।
 9.  पञ्चमेश से युत तथा नवमेश युक्त ग्रह दशा उत्तम फलप्रद होती है।
 10. पापग्रह से दृष्ट ग्रह की दशा हानिप्रद तथा शुभ ग्रह युक्त दशा लाभप्रद होती है।
 11. पञ्चमेश युक्त लग्नेश दशा जैसे राज्यप्रदा होती है, इसी प्रकार धर्मेश युक्त लग्नेश
     की दशा में राज्यादि सुखोदय होता है।
 12. पञ्चमेश युक्त नवमेश की दशा में अर्थलाभ के साथ जैसे राज्य सुख प्राप्ति होती है,
     उसी तरह नवमेश युक्त पञ्चमेश दशा का भी फल होता है।
 13. पञ्चमेश युक्त दशमेश की दशा की तरह चतुर्थेश युक्त नवमेश दशा भी शुभप्रद होती है।
 14. शुभस्थानगत नवमेश दशा में मानार्थ सुख लाभ जैसे होता है, उसी प्रकार चतुर्थेश युक्त
     नवमेश दशा में भी शुभोदय होता है।
 15. षष्ठ या सप्तम भावों में किसी एक का स्वामी यदि नवमस्थ हो तो ऐसे नवमस्थ ग्रह की 
     भी दशा शुभोदय कारक होती है, तथा षष्ठसप्तमाधीश दोनों में एक से युत नवमेश दशा शुभाय
     होती है।
 16. द्वितीय चतुर्थ भावाधीशों में यदि एक भी ग्रह चतुर्थग होता है तो इससे युक्त किसी
     ग्रह की दशा में शुभफल प्राप्ति होती है।
 17. कालशास्त्रज्ञों ने पञ्चमेश से युत षष्ठ सप्तम व्ययाधीशों की दशा शुभ फलप्रद कहा 
     है।
 18. जिस जातक का चतुर्थेश दशम में, दशमेश चतुर्थ में हो तो उन उन दशाओं में दैवज्ञ समूह
     से शुभफल की प्राप्ति कही गई है।
 19. जिस जातक की जन्मपत्री में चतुर्थ-पञ्चम-नवम-दशामाधीश ग्रह एक साथ होते हैं तो उनमें
     किसी एक की दशा शुभाय होती है, तथा उक्त ग्रहों के साथ और जो ग्रह हों या उक्त ग्रहों
     पर जिसकी दृष्टि होती है, उस उस ग्रह की दशा भी शुभोदयकारक होती है।
 20. चतुर्थ भावस्थ पञ्चमेश ग्रह एवं सुखराशिगत दशमेश की दशा शुभप्रद होती है।
 21. कर्मेश और पञ्चमेश इन दोनों से युत और दृष्ट जो ग्रह हो, उसकी दशा एवं अन्तरों में
     दैवज्ञों के मत से राज्यलाभ योग होता है।
 22. दशायस्थ पञ्चमेश और नवमेश दशा में राज्य प्राप्ति होती है।

### **पंचम परिच्‍छेद**

 1.  दशा अंतरदशा के साथ पांच प्रकार की भुक्ति (अंतर-प्रत्‍यंतर आदि) कही जा रही है।
 2.  अपने द्रेष्काण, अपने नवांश एवं अपने द्वादशांशगत लग्नेश की अन्तरदशा शुभमय होती 
     है।
 3.  यह फलित ज्योतिष के मर्मज्ञ यवनाचार्यों का मत है।
 4.  तथा 5. मित्रग्रह स्वक्षेत्रांश तथा मित्र त्रिशांश स्थित तथा अपने त्रिशांशस्य तथा
     मित्रराशि नवांश द्वादशांश ग्रह की अन्तर्दशा भी शुभ फलदायक होती है।
 5.  ……….
 6.  पञ्चम या पञ्चमभाव के नवांश में और पञ्चमभाव के द्वादशांश या मित्रद्रेष्काणगत ग्रह
     की भुक्तियों अर्थात् अन्तर्दशा प्रत्यन्तर सूक्ष्म और प्राणदशा समयों में शुभ फल
     होता है।
 7.  नवमभावस्थ राशि उसके नवांश या उसके द्वादशांश या गुरु के द्रेष्काणगत ग्रह की अन्तरादि
     भुक्तियों में शुभ फलोदय होता है।
 8.  चतुर्थ राशि नवांश द्वादशांशगत या चतुर्थ राशि द्रेष्काणगत ग्रहों की भुक्तियों में
     शुभफल प्राप्ति होती है।
 9.  लग्नेश की राशि स्थित नवांश नाथ ग्रह, मित्र राशिगत हो या मित्र ग्रह से दृष्ट हो
     अथवा लग्नेश राशि स्थित ग्रह मित्र द्रेष्काण में हो तो उसकी भुक्ति में शुभ फल होता
     है।
 10. षष्ठाष्टमद्वादशाधीश ग्रहों की दशा सदा दुःखदा होती है।
 11. मारकेश युक्त षष्ठेश यदि लग्नाधिप हो तो ऐसे अन्तरादि में ज्वर रोग होता है।
 12. षष्ठेश युक्त लग्नेश यदि चन्द्रषड्वर्ग में हो तो दशादि समय में शरीर में जलदोष एवं
     अजीर्ण होता है।
 13. बुध षड्वर्गत षष्ठेश युक्त लग्नेश की अन्तरादि दशा समयों में वायुरोग वा देहशून्यता
     का रोग होता है।
 14. बृहस्पति षड्वर्ग स्थित षष्ठेश युत लग्नेश के अन्तरादि में, रोग और ब्राह्मण से कष्ट
     प्राप्त होता है।
 15. शुक्रषड्वर्गास्थित षष्ठेश युत लग्नेश की दशा में शरीर पीड़ा के साथ स्त्री सङ्ग 
     जन्य रोग होता है।
 16. शनि ग्रह के षड्वर्गस्थ, रोगेश युक्त लग्नेश की दशादिकों में बात रोग होता है, अथवा
     प्रबल रोग योग से सन्निपात भी होता है।
 17. लग्नेश और रोगेश की दशाओं में मारकेश ग्रह की अन्तर दशा में शस्त्रादि घात से शरीर
     में बहुत पीड़ा होती है।
 18. अष्टम भावगत राहु से युत शनि और मंगल की दशा और मारक ग्रह की अन्तर दशादि प्रत्यन्तर
     समयों में स्वास और विसूचिकादि रोग होते हैं।
 19. इसी प्रकार भाई (तीसराभावादि) आदिक द्वादश भावों के स्वामी ग्रह जहाँ बैठे हों, उस-
     उस भाव के पति की षड्वर्गादि स्थिति वश फलादेश करना चाहिए।
 20. तथा 21. : लग्नेश और रोगेश यदि अष्टमेश से युक्त हों, रोगेश के नवांश रोगेश और रोगेश
     का अंशपति ग्रह यदि क्रूर ग्रह हों तो इनके अन्तर प्रत्यन्तरादि समयों में जातक को
     शस्त्र पीड़ा होती है। शुभ योग से मात्र बाधा या कष्ट समझते हुए अशुभ सम्बन्धिन तो
     मृत्यु योग ही कहा जाता है।
 21. …………..
 22. बृहस्पति और बृहस्पति जिस ग्रह के वर्ग में है, तथा मूलांश मूल वर्ग से षष्ठेश और
     षष्ठेशांशादि वर्ग स्वभावज ग्रह, धातु-मूल-जीव त्रिविभागीय प्रकृति के विभिन्न विभेदों
     से रोगोत्पत्ति का विचार करना चाहिए।
 23. लग्नेश का जो नवांश पति, उस पर अष्टमेश स्थानीय राशिपति की दृष्टि या योग हो, और 
     ये दोनों यदि मेष राशि के षड्वर्ग में हों तो उक्त दोनों की दशान्तरादि में श्रृगाल
     से मृत्यु होती है।
 24. उक्त दोनों ग्रह यदि विषम राशि के वर्ग में होते है तो व्याघ्र से, समराशि के वर्ग
     में हो तो वानर से भय होता है।
 25. उक्त दोनों यदि कर्क राशि के षड्वर्ग में हों तो गदहे से तथा सिंह राशि के वर्गगत
     होने से व्याघ्र से भय होता है।
 26. वृश्चिक राशि के वर्गस्थ स्थिति में मृगा से, और धनु राशि के वर्गगत स्थिति में घोड़े
     से भय होता है।
 27. कन्या राशि वर्गगत स्थिति में भालू से, तुला राशि वर्गगत स्थिति से उनकी अन्तर दशाओं
     में मृग से भय होता है।
 28. उक्त दोनों की मकर राशिगत स्थिति से कांटे से भय और मीनराशि षडवर्ग गत स्थिति से,
     मेढ़ा घोड़ा आदि से भय होता है।
 29. कुम्भ वर्गगत उक्त ग्रहों से, गोलाङ्गुल से भय होता है इस प्रकार लग्नादि द्वादश 
     भावों में षड्वर्ग ग्रह गति से फल समझना चाहिए।
 30. लग्नेश और अष्टमेश एक स्थान में वृष राशि, वृष नवांश, वृष के ही दृक्काण में हों 
     तो वृष ( बैल ) से, शुक्र की दशा और भुक्ति में मरण होता है।
 31. उक्त दोनों वृष राशिस्थ मिथुन के नवांशगत होते हैं तो उनकी दशादि अन्तर दशाओं में
     बाघ के आघात जन्य भय होता है । तथा वृष राशिगत कर्क नवांश में होने से उक्त भुक्तियों
     में धनुष आदि से भय होता है।
 32. वृषस्थ कन्या नवांशगत स्थिति में उनकी शुक्र-बुध की दशादि में वानर के आघात से भय,
     वृष राशिस्थ तुला नवांश में हों तो व्याघ्र से भय और मृत्यु होती है।
 33. वृष राशिस्थ कुम्भ नवांशगत होने से गोलाङ्गल रोग से मृत्यु, एवं मीन नवांशगत वृष 
     राशि की स्थिति में उनके स्वामियों के अन्तरादि में हरिण से भय होता है।
 34. मीन नवांशगत होने से दोनों की अन्तर दशाओं में मृग से भय होता है इस प्रकार पिता 
     मातादि ग्रहों से भी विचार करना चाहिए।
 35. अष्टमेश युत सिंह राशिगत लग्नेश या मकर के नवांश में हो तो लग्नेश अष्टमेश की दशा
     या अन्तरदशा में चूहा से भय एवं सर्प से मरण की सही भविष्यवाणी, उदार ज्योतिषी से
     होनी ही चाहिए।
 36. लग्नेश और अष्टमेश सिंह राशिस्थ कन्या राशि के नवांश में होते हैं तो (सूर्य-बुध)
     उनकी दशा में वानर से मरण, तथा सिंहस्थ तुला नवांशगत हों तो कारण विशेष से मरण कहना
     चाहिए।
 37. उक्त दोनों सिंह राशिस्थ वृश्चिक के नवांश में हों तो सांप से मृत्यु, सिंह राशिगत
     धनु राशिस्थ होने से उस वर्ष में (जिस वर्ष उक्त दोनों में एक की दशा दूसरे की अन्तरादि
     दशा हो) कुत्ते से मरण कहना चाहिए।
 38. सिंह राशि गत मकर नवांश में होने से उन दोनों की दशादि में ज्वर रोग से मृत्यु होती
     है । सिंह गत कुम्भ राशि नवांश में होने से उनकी दशादि में राज से राजभय होता है।
 39. उक्त दोनों की सिंह राशि गत मीन नवांश स्थिति से हाथी से भय, सिंह राशि गत मेष नवांश
     में श्रृगाल से भय होता है।
 40. उक्त दोनों सिंह राशि गत वृष नवांश में हों तो उनके नाथों की दशादि में कुत्ते के
     काटने से मृत्यु तथा सिंह राशिगत मिथुन नवांश में गोलांगुल से भय कहना चाहिए।
 41. उक्त दोनों की कर्क राशिस्थ सिंह नवांश गत स्थिति से अग्नि दाह से मृत्यु होती है।
     इस प्रकार भाई आदिक भावों के सम्बन्ध से भाई, माता, पिता आदिकों का मरण कहना चाहिए।
 42. अष्टमेश युक्त लग्नेश धनु राशिस्थ धनु नवांश में होने से उन दशाओं में घोड़े से मरण
     कहना चाहिए । कालज्ञ महान् व्यक्तियों का अनुभवगम्य यह फलादेश है।
 43. धनु राशिस्थ लग्नेश और अष्टमेश, मकर नवांश गत हों तो इनकी दशान्तर्दशादि समयों में
     हाथी से भय होता है । धनुराशिस्थ कुम्भ नवांश गत स्थिति में सूअर से भय कहना चाहिए।
 44. धनु राशिस्थ मीन नवांश में नक्र मकर से, मेष नवांशस्थ होने से चतुष्पद घोड़ा हाथी
     कुत्ता भैंसा आदि से भय होता है।
 45. वृषांश में धनुराशिस्थ लग्नेशाष्टमेश की दशादि में गदहे से भय कहना चाहिए । धनुराशिस्थ
     मिथुन नवांश की स्थिति में बन्दर से भय होता है।
 46. धनुराशिगत कर्क नवांशस्थ लग्नेशाष्टमेश की दशादि समयों में चूहा ( मूषा ) से भय, 
     सिंह राशि नवांश गत उक्त दोनों की स्थिति से सियार से भय होता है।
 47. उक्त दोनों धनु राशि स्थित कन्या नवांश गत हों तो गोलाङ्गूल से भय कहना चाहिए। तथा
     धनु राशिस्थ तुलांशगत होने से उनके दशादि अन्तर दशाओं में ऊँट से भय होता है।
 48. उक्त दोनों की धनुराशिस्थ वृश्चिकांश की स्थिति से सर्प से भय होता है। इसी प्रकार
     भ्रातृ प्रभृति भावेशों का अष्टमेश ग्रह सम्बन्ध से भाई माता पुत्रपितादि का विचार
     करना चाहिए।
 49. मकर राशिगत लग्नेश और अष्टमेश मकर के ही नवांश में हों तो उनकी दशा में विवाह सम्बन्ध
     के लिए शीघ्र परस्पर प्रीति होती है। ऐसा विद्वानों का मत है।
 50. मकर राशिस्थ कुम्भ नवांश गत स्थिति से उनकी दशाओं में भालू से भय, मकर राशिस्थ मीन
     नवांश में हाथी से भय होता है।
 51. उक्त दोनों की मकर राशिस्थ स्थिति में मेष नवांश गत स्थिति से दशाओं में जल से भय,
     मकर राशिस्थ वृषांश से व्रज से भय होता है।
 52. मकर राशिस्थ मिथुन नवांश गत से हरिण से, कर्क नवांश स्थिति से हाथी से मृत्यु होती
     है।
 53. मकरस्थ सिंह नवांश से महापातक जन्य भय, कन्या नवांश गत से वानर से भय होता है।
 54. तुला नवांशस्थ मकर राशि में, नकुल से, मकर राशिस्थ वृश्चिक नवांश में लग्नेशाष्टमेश
     की दशान्तर्दशादि में बिल्ली से भय कहना चाहिए।
 55. मकर राशिस्थ लग्नेशाष्टमेश धनु राशि नवांशस्थ हों तो रासभ (गदहे) से भय होता है।
 56. बुद्धिमान् दैवज्ञ ने इस शैली से पिता मातादि सभी भावों का विचार कर उनकी मृत्यु 
     का कारण बता देना चाहिए।

### **षष्‍ठम परिच्‍छेद**

 1.  ग्रहों की उस जातिभेद का जो शास्त्रों का तत्त्व रूप संग्रह है, उसका वर्णन किया 
     जा रहा है । बालानां बोधनार्थाय का स्पष्ट तात्पर्य यह है कि यदि अवस्था से जातक 
     विद्वान् अस्‍सी, नब्‍बे, सौ या एक सौ बीस वर्ष की आयु का भी वृद्धावस्था का क्यों
     न हो, किन्तु जिस विषय में उसका अध्ययनाध्यापनादि प्रवेश नहीं हुआ है, उस विषय के
     लिए अध्ययन प्रेमी शतायु पुरुष को भी बाल शब्द से सम्बोधित किया जाता है, क्योंकि
     इस अध्ययन में अभी वह बालक रूप है, आचार्यों से इसलिए “बालकों के सुख बोधाय” उक्त
     पद्य का प्रयोग हुआ है।
 2.  गुरु और शुक्र ग्रह ब्राह्मण, सूर्यमंगल क्षत्रिय, चन्द्र बुध वैश्य, शनि शूद्र और
     राहु को अन्त्यज कहा गया है।
 3.  मीन राशि ब्राह्मण, मेष क्षत्रिय, वृष वैश्य और मिथुन शूद्र राशि क्रम से मीन-कर्क
     और वृश्चिक राशियाँ ब्राह्मण, मेष-सिंह और धनु राशियाँ क्षत्रिय, वृष-कन्या और मकर
     राशियाँ वैश्य तथा मिथुन-तुला और कुम्भ राशियों की वर्ण से शूद्र संज्ञा कही गई है।
 4.  सूर्य-गुरु-मंगल-चन्द्र-गुरु-बुध-शुक्र-शनि-गुरु-चन्द्र-गुरु और शनि ये ग्रह लग्नादि
     द्वादश भावों के कारक होते हैं। जैसे सूर्य ग्रह लग्न का कारक है, बृहस्पति ग्रह 
     धन कारक कहा गया है, इत्यादि समझिये।
 5.  सूर्य पितृकारक, मातृकारक चन्द्रमा, बुध शनि और शुक्र भ्रातृ कारक, पुत्रकारक मंगल,
     सूर्य मित्रकारक, राहु और शनि शत्रु कारक होके हैं।
 6.  प्रकारान्तर से ५ श्लोक का आशय व्यक्त हुआ है।
 7.  तथा 8. शनि मंगल पितृ भाव के सहयोगी, बुध-बृहस्पति और शुक्र ग्रह भ्रातृभाव के सहयोगी,
     सूर्य चन्द्र राज सहायक, मंगल राजनायक, बुध राजकुमार का सहयोगी, गुरु शुक्र राष्ट्र
     को मन्त्रणा देते हैं। इन सभी ग्रहों की दृष्टियोग से पृथक-पृथक फलादेश करना चाहिए।
 8.  ……….
 9.  मेष राशिगत शनि भी पितृकारक कह गया है। ग्रहों की अपने-अपने स्थानों में फल-दान की
     शक्ति उत्पन्न होती है।
 10. जो भावेश जिस ग्रह के षड वर्ग में स्थित है, उस उस ग्रह की दशादि में उस उस ग्रह 
     के कथित द्रव्य की प्राप्ति होती है।
 11. सूर्य नवांश स्थित दशा स्वामी के समय में राजा से मान धन प्राप्ति होती है अथवा पितृ
     सम्बन्धियों से धनाप्ति होती है। चन्द्र नवांश से मातृ वर्ग से लाभ होता है।
 12. मंगल नवांश स्थित दशा स्वामी से पुत्र वर्ग अथवा सेना नायक से धन प्राप्ति होती है।
     बुध नवांश से भ्रातृ वर्ग या राज पुत्र से लाभ होता है।
 13. गुरु नवांशगत दशा स्वामी मातृ या मन्त्री वर्ग द्वारा, शुक्र नवांशगत हो तो भ्रातृवर्ग
     या स्त्री वर्ग द्वारा शुभफलानि कहनी चाहिए।
 14. शनि नवांशगत दशाधीश से शूद्र वर्ग से, या भृत्य से लाभ होता है। आचार्यों के मतान्तर
     से राहु की उक्त स्थिति से शूद्र से लाभ होता है।
 15. शनि मंगल की दशाओं में पितृ सम्बन्धी फलाभाव और गुरु शुक्र की दशाओं में मामा और 
     नौकर वर्ग से लाभ नहीं होता है।
 16. बृहस्पति की दशान्तरदशादि में ब्राह्मणा जाति से अंशानुकूल नवांशानुकूल फल प्राप्ति
     होती है। प्रथम नवांश में 1/9 फल द्वितीय में 2/9, तृतीय में तिहाई, छठे नवांश में
     दो तिहाई एवं अन्तिम नवांश में पूर्ण फलप्राप्ति समझ कर आदेश करना चाहिए।

### ** ****सप्‍तम परिच्‍छेद**

 1.  प्रथम पांच पद्यों का स्पष्टाशय लघुपाराशरी पूर्वार्ध में देखना होगा।
 2.  छठे सातवें तथा आठवें पद्य में कहा गया है कि शनि-बुध शुक्र को पाप ग्रह, सूर्य बृहस्पति
     शुभ यह हैं। शनि युक्त गुरु भी परतन्त्र हेतु से पाप ग्रह हो जाता है। स्वयं मारकेश
     होने से शुक्र ही मारकेश हो जाता है। पापी ग्रह होते हुए भी शनि प्रबल मारक नहीं 
     होता है। मेष राशि गत शनि से पूर्वोक्त विचार पूर्वक विचार करना चाहिए।
 3.  नौंवे पद्य में कहा गया है कि चन्द्र-गुरु-शुक्र पाप ग्रह, बुध और शनि शुभग्रह हैं।
     शनि ग्रह ही एक स्वतन्त्र रूपेण राजयोगकारक होता है।
 4.  – दसवें पद्य के अनुसार जीवादि बृहस्पति-शुक्र चन्द्रमा ये मारक ग्रह हैं । यह स्थिति
     वृषराशिज जातक के जन्म से विचारना चाहिए।
 5.  – एकादश पद्य के अनुसार सूर्य मंगल और बृहस्पति पाप ग्रह हैं । मात्र शुक्र ही एक
     शुभ ग्रह है । मेषराशिस्थ के लिए शनियुत बृहस्पति पाप ग्रह कहा गया है; तद्वत् यहाँ
     समझिये । बृहस्पति स्वतन्त्र पाप नहीं है।
 6.  द्वादश पद्य के अनुसार मिथुन राशि लग्नज के लिए, केवल चन्द्रमा मारक नहीं होता अपितु
     पाप योग को निष्फल करने में चन्द्रमा समर्थ होता है।
 7.  – त्रयोदश पद्य के अनुसार शुक्र-चन्द्रमा पाप ग्रह हैं । मंगल-गुरु शुभ ग्रह हैं ।
     केवल मंगल ग्रह योगकारक होता है।
 8.  चतुर्दश पद्य के अनुसार कर्क राशिगत जातक के लिए शुक्र मारक होते हुए पाप ग्रह भी
     मारक होते हैं।
 9.  – पंचदश पद्य के अनुसार जैसे बुध-शुक्र पाप ग्रह हैं, वैसे मंगल-बृहस्पति शुभ ग्रह
     होते हैं । शुक्र-मंगल का योग शुभाय नहीं होता है।
 10. – षडदश पद्य के अनुसार बुधादि ग्रह मारक होने पर प्रबल होते हैं । सिंह लग्न राशि
     से उक्त विचार फल होता है।
 11. – सप्‍तदश पद्य के अनुसार चन्द्र, मंगल, गुरु पाप ग्रह होते हैं । केवल शुक्र शुभ
     होता है । ऐसी स्थिति में शुक्र और बुध योगकारक होते हैं।
 12. अष्‍टदश पद्य के अनुसार कन्या लग्न राशिज जातकों के लिए शुक्र मारक नहीं होता, मङ्गलादिक
     पाप ग्रह मारक होते हैं।
 13. एकोनविंशति पद्य के अनुसार सूर्य, मङ्गल और जीव पाप होते हैं और शनि-बुध शुभ होते
     हैं। ऐसी स्थिति में चन्द्रमा और बुध राजयोग कारक हो जाते हैं।
 14. विंशति पद्य के अनुसार तुला लग्न राशिज के लिए वृश्चिकेश मारक नहीं होता। बृहस्पति
     आदिक ग्रहों में मारकत्व धर्म आता है।
 15. एकविंशति पद्य के अनुसार किसी लग्न राशि से बुध, मङ्गल और शुक्र पाप ग्रह हो जाते
     हैं, बृहस्पति चन्द्रमा में शुभत्व से चन्द्रमा योगकारक हो जाता है।
 16. द्विवंशित पद्य के अनुसार वृश्चिक लग्न राशिजों के लिए गुरु मारक नहीं होता, अपिच
     अन्य सौम्य ग्रह मारक होते हैं।
 17. तेइसवें पद्य के अनुसार मात्र शुक्र एक पाप ग्रह है। मंगल-सूर्य शुभ हो जाते हैं।
     सूर्य-बुध से राजयोग होता है। शनि मारक नहीं होता है।
 18. चौबीसवें पद्य के अनुसार धनु राशि से शुक्रादि मारक होने से मारक होते हैं।
 19. – पच्‍चीसवें तथा छब्‍बीसवें पद्य के अनुसार मकर राशिज के लिए चन्द्र, मङ्गल और गुरु
     पाप ग्रह हो जाते हैं । शुक्र-चन्द्रमा शुभ ग्रह होते हैं । शनि मारक नहीं होता ।
     मारक लक्षण लक्षित होने से भोमादिक ग्रह मारक हो जाते हैं । मात्र शुक्र ग्रह योगकारक
     हो जाता है।
 20. – सत्‍ताइसवें तथा अठाइसवें पद्य के अनुसार मीन राशिज जातक के लिए सूर्य, शुक्र, 
     बुध और रवि पाप ग्रह हैं । चन्द्र-मंगल शुभ ग्रह हैं। मंगल-बृहस्पति योगकारक होते
     हैं। मारक सम्बन्ध सम्बन्धित मंगल मारक नहीं होता । मारक लक्षण लक्षित बुध और शनि
     मारक होते हैं।
 21. उन्‍नतीसवें पद्य के अनुसार मंगल और गुरु की योग कारिता से शनि शुक्र सूर्य और बुध
     ग्रह पाप ग्रह तथा मंगल और चन्द्रमा शुभ ग्रह होते हैं।
 22. तीसवें पद्य के अनुसार शनि और बुध दोनों पाप ग्रह मारकेश सम्बन्ध से मारक होते हैं
     ये विचार मीन लग्न जन्मा जातक से करना चाहिए। इस शास्त्रानुसार विद्वान् दैवज्ञ को
     भविष्य विचार करना चाहिये ।
 23. इकतीसवें पद्य के अनुसार चन्द्र-मंगल को छोड़कर सभी ग्रह मारक हो जाते हैं ।
 24. बत्‍तीसवें पद्य के अनुसार मारक ग्रह की दशा में मरण नहीं होता । मारक ग्रह की दशा
     में किसी अन्य ग्रह की अन्तर्दशा में जातक का निधन होता है । इसी प्रकार किसी ग्रह
     की दशा में मारक ग्रह की अन्तर्दशा में भी मरण नहीं हो सकता इत्यादि।

### ** ****अष्‍टम परिच्‍छेद**** **

 1.  जन्म लग्न से जातक का रंग, रूप, कीर्ति, स्थिति, स्वरूप और सम्पत्ति आदि का साङ्गोपाङ्ग
     निरूपण करना चाहिये।
 2.  दूसरे स्थान ( भाव ) से धन सुख, भोग, बहुभाषण, सत्यभाषण, दक्षिण नेत्र और अल्पहारादि
     विचार करने चाहिये।
 3.  तीसरे भाव से भाई, गला, विक्रम, क्षुधा, भूषण, पात्रता के साथ अन्य भ्रातृस्थान जन्य
     विचार करने चाहिये।
 4.  बन्धु, वाहन, माता, राज्य, सुख-घर-सुहृद मित्र और बाहुबल आदि का विचार चतुर्थ भाव
     से करना चाहिये।
 5.  पुत्र, बुद्धि, मित्र, देवता, भक्ति, हृदय और मामा परिवार का विचार पञ्चम भाव से 
     करना चाहिये।
 6.  रिपु-ज्ञाति-बल-रोग-उदर-शत्रु प्रभृति का विचार षष्ठस्थान से करना चाहिये।
 7.  सप्तम भाव से स्त्री सम्बन्धी भोग, छत्र, दन्त, नाभि रोगादिक का विचार करना चाहिये
     तथा गुप्तस्थान, जीवन, मरण प्रभृति विचार अष्टम भाव से करना चाहिये।
 8.  नवम भाव में भाग्य-तीर्थ-धर्म-पिता-गुरु आदि सभी का विचार करना चाहिये तथा मान, राज्य,
     त्याग, कीर्ति, कर्म और व्यापार का विचार दशम भाव से करना चाहिये।
 9.  ज्येष्ठ भ्रातृ, अनेक प्रकार के लाभ, कान, जङ्घा आदि का लाभभाव एकादश से विचार करना
     चाहिये । इसी प्रकार व्यय अर्थात् १२ वें भाव से व्यय, पिता का धन, वाद-विवाद, स्त्री
     आदि का नाम विचारादि करना चाहिये।
 10. वृष, कर्क, मकर, कुम्भ और मीन ये पाँचों राशियां जलचर राशि कही गयी हैं । शेष मेष,
     मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक और धनु राशियों को निर्जल राशि कहा गया है।
