# ज्‍योतिष में मानसिक रोग : चंद्र, बुध और राहु विश्‍लेषण

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- Published: 2020-02-12T22:07:01+05:30
- Author: Astrologer Sidharth

## मानसिक रोग : चंद्र, बुध और राहु विश्‍लेषण⏎  (Mental Disorder : Moon, Mercury and Rahu)

 मानसिक रोग को अधिकांशत: पागलपन (Lunatic) मान लिया जाता है, जबकि हकीकत यह है कि 
मानसिक रोग mental disorder किसी भी स्‍वस्‍थ दिखने वाले इंसान को हो सकता है और उसके
लक्षण भी सालों तक सामने नहीं आते। ऐसे में ज्‍योतिष में मानसिक रोग (Mental disorder)
की चर्चा करते समय हम न केवल मानसिक रूप से विक्षिप्‍त जातकों के बारे में बात करेंगे,
बल्कि अवसाद और ओबसेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर से लेकर स्किजोफ्रेनिया के आरंभिक लक्षणों
तक को शामिल करने का प्रयास करेंगे।

मनोचिकित्‍सकों (Psychiatrist) और मनोविज्ञानियों (Psychologist) की मानें तो दुनिया
का लगभग हर इंसान मानसिक रोग से महज दो प्रतिशत की दूरी पर खड़ा है। मानसिक संतुलन 
49 प्रतिशत पर है तो कोई भी व्‍यक्ति संतुलित दिखाई देता है और यह संतुलन 51 प्रतिशत
खराबी पर आए तो इंसान का व्‍यवहार असंतुलित हो जाता है।

ज्‍योतिषीय कोण से हमें मानसिक रोग को दो स्‍तर पर देखना होगा। पहला यह कि क्‍या जातक
में रोग होने के लक्षण विद्यमान हैं और अगर हां तो रोग के लक्षण प्रकट होने की आशंका
कब सर्वाधिक है। कोई इंसान अपनी युवावस्‍था अथवा अधेड़ावस्‍था तक सामान्‍य जीवन जीने
के बाद भी विक्षिप्‍त हो सकता है तो कुछ मामलों में बचपन से ही लक्षण दिखाई देने लगते
हैं।

सामान्‍य तौर पर केन्‍द्रीय तंत्रिका तंत्र (Central nervous system) को चंद्रमा से
जोड़ा गया है। अगर किसी जातक की कुण्‍डली में चंद्रमा कमजोर हो तो उसके अवसाद (Depression)
में आने की आशंका बहुत अधिक होती है। दूसरा पक्ष बुध से जुड़ा है। बुध को वाणी और बुद्धि
या कहें reasoning यानी तार्किकता का ग्रह माना गया है। बुध के पीडि़त होने पर जातक
की सहज सोचने समझने की बुद्धि भ्रष्‍ट होती है। इन दोनों ग्रहों की स्थिति से जातक 
में मानसिक रोग के लक्षणों को स्थिर किया जा सकता है। इसके अलावा दूसरे भी कारक हो 
सकते हैं, जिन पर आगे विस्‍तार में बात करेंगे।

जब समय की बात हो तो बुध, चंद्रमा और राहु की महादशा, अंतरदशा और प्रत्‍यंतर में मानसिक
रोग के ट्रिगर trigger होने की आशंका सर्वाधिक होती है। यानी मन का कारक चंद्रमा, तार्किकता
का कारक बुध और अनिश्चिता का ग्रह राहु ये तीनों अपनी दशा, अंतरदशा और प्रत्‍यंतरदशा
के दौरान रोग के लक्षणों को स्‍पष्‍ट उजागर कर सकते हैं अथवा बढ़ा सकते हैं।

जिन जातकों में ज्‍योतिषीय कोण से रोग के लक्षण मौजूद हों, यानी चंद्रमा खराब हो, उनके
जीवन में पूर्णमासी (Full moon) और अमावस्‍या के दौरान मानसिक विचलन अधिक देखे जाते
रहे हैं, ऐसे में कुछ क्षेत्रों में ऐसे जातकों को चांदमारा भी कहा जाता है। अगर मानसिक
रोगों को समझना शुरू करना है तो पहले हमें तंत्रिका तंत्र और इसके कारक चंद्रमा को 
समझना होगा। ज्‍योतिष में चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है। यहां मन केवल अधिभौतिक
तथ्‍य नहीं बल्कि मानव जीवन को दैनंदिन प्रभावित करने वाला कारक है।

### ज्‍योतिष में चंद्रमा के मानसिक रोग (Mental Disorder due to Moon)

मन के कारण चंद्रमा को ज्‍योतिष में सभी विचार का जनक माना गया है। यह तब तक ही शुभफलदायी
होता है, जब तक यह शुभ प्रभाव में और शक्तिशाली हो। अगर चंद्रमा दुर्बल है, अगर चंद्रमा
अशुभ प्रभाव में है तो जातक को मानसिक रूप से परेशान करता है।

रूपक या कहें Metaphorically समझा जाए तो चंद्रमा को पानी माना जा सकता है। चाहे वह
RO का संशोधित पानी हो, नदी का प्रवाहमान जल हो अथवा समुद्र का नमकीन जल Saline water
हो। हर प्रकार का जल जो कि गुणों को साथ में लेने के बाद भी अपने स्‍वरूप को बरकरार
रखे, वह चंद्रमा है। अब इस चंद्रमा में कई प्रकार के भेद इसमें शामिल होने वाले गुणों
के कारण आते हैं। मूल रूप से द्रव चंद्रमा है, अब जो भी बाह्य वस्‍तु इसमें शामिल है,
वह इसके प्रभाव में परिवर्तन कर देती है।

रक्‍त में द्रव है, अब चूंकि इस द्रव में रक्‍त के एलीमेंट मिल गए हैं, तो यह चंद्रमा
नहीं रह जाएगा, इसका कारकत्‍व मंगल के पास चला जाएगा। मंगल के पास भी रक्‍त का कारकत्‍व
तब तक है, जब तक यह जीवंत है, अगर रक्‍त पुराना है और मृत है, तो यह मंगल नहीं रह जाएगा,
तब यह विकृत चंद्रमा होगा।

इसी तरह सुगंधित जल या कहें शर्बत में मूल रूप से चंद्र का द्रव है, लेकिन चूंकि इसमें
पृथ्‍वीतत्‍व की गंध आ मिली है, ऐसे में यह शुक्र का पदार्थ बन जाता है। यह शुक्र का
पदार्थ तब तक रहेगा, जब तक सुगंध बनी रहेगी, जैसे ही द्रव में से सुगंध निकल जाएगी,
यह फिर से चंद्रमा का द्रव बन जाएगा।

नदी का निर्मल जल, जिसमें पहाड़ों और नदी किनारों की धूल और लवण शामिल है, शुद्ध चंद्रमा
के हिस्‍से ही आएंगे, लेकिन जैसे ही इस जल में मूल मूत्र अथवा गंदे नाले का पानी शामिल
होता है, यह शुक्र और राहु के पास चला जाता है, तब इसे चंद्र मूल नहीं मान सकते।

इस प्रकार हम देखते हैं कि चंद्र तब तक चंद्र के मूल स्‍वरूप में है, जब तक द्रव की
संरचना में किसी प्रकार का विचलन नहीं हुआ होता है। जैसे ही संरचना बदलेगी, चंद्र भी
नदारद हो जाएगा।

कुण्‍डली में भी चंद्रमा सदैव अकेला नहीं होता है, सदैव शुभ प्रभाव में नहीं होता है।
जब यह सूर्य के साथ होगा, तो अपने विपरीत प्रभाव वाले ग्रह के साथ होगा, ऐसे में सूर्य
और चंद्रमा साथ में होने पर जातक में भी ऐसा ही द्विस्‍वभाव दिखाई देता है। बुध के 
साथ होने पर चंद्रमा शुभता को प्राप्‍त करता है, लेकिन चूंकि बुध की चंद्रमा से नैसर्गिक
शत्रुता है, ऐसे में यहां बुध पीडि़त हो जाएगा। पीडि़त बुध और मानसिक रोग पर हम आगे
चर्चा करेंगे। लेकिन चंद्रमा के कारण से यहां पीड़ा नहीं होगी। गुरू के साथ चंद्रमा
गजकेसरी जैसा राजयोग कारक योग बनाता है, चंद्रमा के साथ मंगल होने पर लक्ष्‍मी योग 
बनता है और शुक्र होने पर भी अनुकूलता मिलती है। चंद्रमा अगर राहु, केतुु, शनि और स्‍वयं
क्षीण हो तो कष्‍टदायक होता है।

### चंद्रमा की स्थिति और प्रभाव (Moon’s position for Mental Disorder)

अगर चंद्रमा अकेला और क्षीण हो तो जातक को भीतर से खाली–खाली महसूस होता है। विचारों
में विविधता नहीं होती। अगर लग्‍न में ऐसा क्षीण चंद्रमा हो तो जातक में कुछ सनक (Craze)
की मात्रा भी होती है। अगर यहां पर चंद्रमा किसी क्रूर ग्रह द्वारा पीडि़त भी हो रहा
हो तो यह सनक कुछ अधिक हो जाती है। ऐसे जातकों में मानसिक रोग होने की आशंका सर्वाधिक
होती है। जरूरी नहीं है कि हर बार मानसिक रोग हो ही, लेकिन बहुत से मामलों में होने
की आशंका बलवती रहती है। कह सकते हैं कि ऐसे जातक में मानसिक रोग के बीज होते हैं, 
अब अगर प्रतिकूल परिस्थितियां मिलें तो ये बीज पेड़ का रूप ले लेते हैं।

चंद्रमा अगर राहु के साथ हो तो विचार शृंखला (Thought process) को प्रभावित करता है।
विचारों को प्रवाह को रोकता नहीं है, बल्कि प्रवाह को पथभ्रष्‍ट कर देता है।

अगर चंद्र शनि के साथ अथवा शनि की दृष्टि में हो तो विचार प्रवाह या तो नकारात्‍मक (
Negative thoughts) रहता है, अथवा विचार संदमित रहते हैं। ऐसे जातकों के डिप्रेशन में
आने की आशंका सर्वाधिक होती है।

अगर चंद्र केतुु के साथ हो तो जातक के स्‍वभाव में चिड़चिड़ापन (Irritating) लेकर आता
है। ऐसा जातक किसी एक काम को सालों तक करते हुए सहज रह सकता है, लेकिन काम में होने
वाले प्रतिकूल बदलाव या परिस्थितियों में होने वाले प्रतिकूल बदलाव ऐसे जातक को पूरी
तरह हिलाकर रख देते हैं।

### बुध की स्थिति और प्रभाव (Mercury and it’s effect on Mental Depression)

सभी प्रकार के जातक इमोशंस पर चलने वाले नहीं होते, कुछ बहुत ही बुद्धिमान और तार्किक
rational होते हैं। तर्कण का आधार लेकर जीवन जी रहे जातकों की कुण्‍डली में अगर बुध
प्रभावित हो तो मानसिक रोग होने की आशंका प्रबल होती है। ऐसे लोग अपने जीवन का बड़ा
भाग बहुत ही बुद्धिमत्‍तापूर्ण तरीके से जी रहे होते हैं कि किसी घटना अथवा स्थिति 
के ठीक बाद अचानक इनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। ऐसा सामान्‍य तौर पर बुध पर राहु
की दृष्टि, बुध के साथ राहु की युति अथवा छठे भाव और बुध का संबंध होने की स्थिति में
होता है। इसके अलावा चंद्रमा और बुध की युति के दौरान अगर चंद्रमा पीडि़त हो रहा हो
तो भी ऐसी स्थिति बनना संभव है।

### राहु की दशा के कारण (Rahu Mahadasha and Depression)

राहु की दशा के दौरान भी जातक की मनोस्थिति खराब रहती है। चंद्रमा की बेहतर स्थिति 
और बुध के अप्रभावित होन के बावजूद भी राहु की महादशा के दौरान अनिश्चितता (uncertainty)
का ऐसा माहौल बनता है कि जातक की सहज बुद्धि उसका साथ छोड़ देती है। इसका परिणाम ऐसा
होता है कि सामान्‍य परिस्थितियां दिखाई देने के बावजूद जातक का व्‍यवहार असामान्‍य
हो जाता है। इस दौर में केवल बहुत अधिक शक्तिशाली बुध और बहुत अनुकूल चंद्रमा वाले 
जातक ही बच पाते हैं। अगर राहु लाभकारी स्थितियों में हो तो भी राहु की दशा के दौरान
प्रतिकूल प्रभाव कम दिखाई देता है, लेकिन कुछ असर बना रहता है।

उपरोक्‍त स्थितियां बहुत साधारण स्थितियां हैं, इन्‍हें देखने पर आसानी से निर्णय किया
जा सकता है कि जातक का मानसिक संतुलन किस प्रकार का है। परन्‍तु इन स्थितियों के इतर
भी बहुत से योग और कारण ऐसे होते हैं, जिनका वर्णन किसी एक विशेष कोण से किया जाना 
संभव नहीं होता। मसलन कन्‍या लग्‍न के जातकों की विश्‍लेषण क्षमता गजब की होती है, 
लेकिन जिस दौर में कन्‍या के जातक किसी विशेष विचार शृंखला में फंस जाएं, तो उनका व्‍यवहार
मानसिक रोगियों जैसा हो जाता है।

केतुु की दशा के दौरान एक ही काम में लगा जातक सामान्‍य व्‍यवहार करता है, लेकिन जैसे
ही अनिश्चितता का माहौल बनता है, उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ने की आशंका बलवती हो जाती
है।

कुण्‍डली में उच्‍च का चंद्रमा अथवा लग्‍न में चंद्रमा होने के बावजूद मैंने निजी तौर
पर कई कुण्‍डलियों में मानसिक रोगी देखे हैं।

गंडमूल नक्षत्रों में पैदा हुए जातक अतिमहत्‍वाकांक्षी (Too ambitious) होते हैं, अगर
इन्‍हें विकास करने अथवा सैटल होने का समय पर रास्‍ता मिल जाता है तो ये नॉर्मल रहते
हैं, लेकिन यदि किन्‍ही कारणों से इनके प्रयास विफल चले जाएं अथवा आगे बढ़ने के रास्‍ते
बंद हो जाएं तो इनका मानसिक संतुलन बिगड़ने की प्रबल आशंका रहती है।

इन स्थितियों के इतर भी मानसिक अथवा स्‍नायु रोग (Neurological disorder) की कई स्थितियां
देखी जाती हैं, जिनका किसी विशेष योग अथवा ग्रह की स्थिति से निर्धारण करने क बजाय 
पूरी कुण्‍डली का विश्‍लेषण करने से ही पता चलता है कि रोग के कारण क्‍या हैं और ऐसे
मानसिक रोगियों की किस प्रकार मदद की जा सकती है।

डिप्रेशन, ऑब्‍सेसिस कंपल्सिव डिसऑर्डर (OCD), फ्रस्‍ट्रेशन जैसे मानसिक रोगों में 
ज्‍योतिषीय उपचारों से बहुत हद तक मदद की जा सकती है, हालांकि इनमें भी पूरी तरह मुख्‍य
चिकित्‍सा पद्धतियों को अनदेखा कर केवल ज्‍योतिष के भरोसे उपचार नहीं किया जाना चाहिए,
फिर भी मदद की जा सकती है। स्किजोफ्रेनिया Schizophrenia, मल्‍टीपल स्‍केलेरोसिस Multiple
sclerosis, एक्‍यूट डिप्रेशन, आत्‍महंता प्रवृत्ति Suicidal tendencies आदि मामलों 
में ज्‍योतिषीय उपचार सामान्‍यत: बहुत मदद नहीं कर पाते हैं, ऐसे मामलों में पहले चिकित्‍सा
की मदद ली जाए और बाद में ज्‍योतिषी से संपर्क किया जाए तो बेहतर है।

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### राहु विशेष: प्रामाणिक शोध, महादशा प्रभाव एवं शास्त्रीय उपाय

ज्योतिषी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी द्वारा लिखित राहु के समस्त 12 शास्त्रीय एवं व्यावहारिक
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