# कुण्‍डली में शनि ग्रह (Planet Shani in Natal Horoscope)

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- Published: 2016-11-03T03:32:50+05:30
- Author: Astrologer Sidharth

### **कुण्‍डली में शनि ग्रह**⏎  **(Planet Shani in Natal Horoscope)**

राहू के बाद अगर ज्‍योतिष शास्‍त्र में कोई डराने वाला ग्रह है तो वह शनि ही है। कुण्‍डली
में शनि की साढ़ेसाती और शनि की दशा के बारे में सुनकर हर जातक खुद को विक्टिम महसूस
करने लगता है, लेकिन हकीकत ऐसी नहीं है, हर स्थिति में शनि खराब ही हो ऐसा नहीं है,
अगर किसी इंसान का चाल चलन सही हो और सभी कार्य न्‍यायपूर्ण हो तो जातक को कभी शनि 
से घबराने की जरूरत नहीं पड़ती। अगर इंसान में यम, नियम, आसन, प्रत्‍याहार, धारणा और
ध्‍यान का अभ्‍यास हो तो वह जातक शनि के शानदार परिणाम हासिल करता है।

न्‍याय का अधिपति शनि ही ऐसा ग्रह है जो किसी जातक को जीवन में अधेड़ावस्‍था में आने
पर उसके वारे न्‍यारे कर देता है, क्‍योंकि इस अवस्‍था में आने तक जातक बहुत कुछ संभल
जाता है और शनि की पूरा उपयोग करता है, वृद्धावस्‍था में आई शनि की दशा खत्‍म होते 
जातक को फिर से खड़ा भी कर देती है, क्‍योंकि शनैश्‍चर यानी धीरे चलने वाला यह ग्रह
वृद्ध पुरुष और स्त्रियों को अधिक प्रिय है। इस लेख में शनि के बारे में हम विस्‍तार
से जानेंगे।

### **खगोलीय विवरण (Saturn’s Astronomical Details)**

नवग्रहों के कक्ष क्रम में शनि सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर 88 करोड 61 लाख मील दूर है।
पृथ्वी से शनि की दूरी 71 करोड 31 लाख 43 हजार मील दूर है। शनि का व्यास 75,100 मील
है, यह छ: मील प्रति सेकेण्ड की गति से 21.5 वर्ष में अपनी कक्षा मे सूर्य की परिक्रमा
पूरी करता है। शनि धरातल का तापमान 240 फॉरनहाइट है। शनि के चारो ओर सात वलय हैं, शनि
के 15 चन्द्रमा हैं। जिनका प्रत्येक का व्यास पृथ्वी से अधिक है।

### **ज्योतिष में शनि (Saturn in Astrology)**

फ़लित ज्योतिष के शास्त्रो में शनि को अनेक नामों से सम्बोधित किया गया है, जैसे मन्दगामी,
सूर्य-पुत्र और शनिश्चर आदि। शनि के नक्षत्र हैं, पुष्य, अनुराधा और उत्तराभाद्रपद।
यह मकर और कुम्भ राशियों का स्वामी है। तुला राशि में 20 अंश पर शनि परमोच्च है और 
मेष राशि के 20 अंश पर परमनीच है। नीलम शनि का रत्न है। शनि की तीसरी, सातवीं, और दसवीं
दृष्टि मानी जाती है। शनि सूर्य, चन्द्र व मंगल का शत्रु, बुध, शुक्र को मित्र तथा 
गुरु को सम मानता है। शारीरिक रोगों में शनि को वायु विकार, कंप, हड्डियों और दंत रोगों
का कारक माना जाता है।

शनि ग्रह के प्रति अनेक आखयान पुराणों में प्राप्त होते हैं। शनि को सूर्य पुत्र माना
जाता है। लेकिन साथ ही पितृ शत्रु भी। शनि ग्रह के सम्बन्ध मे अनेक भ्रान्तियां और 
इस लिये उसे मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी भी उसे दुख देने
वाला मानते हैं। लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है, जितना उसे माना जाता है। इसलिये
वह शत्रु नही मित्र है। मोक्ष को देने वाला एक मात्र शनि ग्रह ही है। सत्य तो यह ही
है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है, और हर प्राणी के साथ न्याय करता है। जो
लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि केवल उन्ही को प्रताडित
करता है।

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**वैदूर्य कांति रमल:, प्रजानां वाणातसी कुसुम वर्ण विभश्च शरत:।**
 **अन्यापि वर्ण
भुव गच्छति तत्सवर्णाभि सूर्यात्मज: अव्यतीति मुनि प्रवाद:॥**

भावार्थ:- शनि ग्रह वैदूर्यरत्न अथवा बाणफ़ूल या अलसी के फ़ूल जैसे निर्मल रंग से जब
प्रकाशित होता है, तो उस समय प्रजा के लिये शुभ फ़ल देता है यह अन्य वर्णों को प्रकाश
देता है, तो उच्च वर्णों को समाप्त करता है, ऐसा ऋषि महात्मा कहते हैं।

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### **शनि देव का जन्म (Birth of ShaniDev)**

मिथकीय कहानी के अनुसार सूर्य की द्वितीय पत्नी के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ, जब
शनि देव छाया के गर्भ में थे तब छाया भगवन शंकर की भक्ति में इतनी ध्यान मग्न थी की
उसने अपने खाने पीने तक सुध नहीं थी जिसका प्रभाव उसके पुत्र पर पड़ा और उसका वर्ण 
श्याम हो गया। शनि के श्यामवर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर आरोप लगाया की
शनि मेरा पुत्र नहीं है। तभी से शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखता है। शनि देव ने अपनी
साधना तपस्या द्वारा शिवजी को प्रसन्न कर अपने पिता सूर्य की भांति शक्ति प्राप्त की
और शिवजी ने शनि देव को वरदान मांगने को कहा, तब शनि देव ने प्रार्थना की कि युगों 
युगों में मेरी माता छाया की पराजय होती रही हैं, मेरे पिता पिता सूर्य द्वारा अनेक
बार अपमानित व प्रताड़ित किया गया है। अतः माता की इच्‍छा है कि मेरा पुत्र अपने पिता
से मेरे अपमान का बदला ले और उनसे भी ज्यादा शक्तिशाली बने। तब भगवान शंकर ने वरदान
देते हुए कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा स्‍थान सर्वश्रेष्ठ होगा। मानव तो क्या देवता
भी तुम्हरे नाम से भयभीत रहेंगे।

### **पौराणिक संदर्भ (Shani in Mythology)**

शनि के सम्बन्ध मे हमे पुराणों में अनेक आख्यान मिलते हैं। माता के छल के कारण पिता
ने उसे शाप दिया। पिता अर्थात सूर्य ने कहा,”आप क्रूरतापूर्ण दृष्टि से देखने वाले 
मंदगामी ग्रह हो जाएं”.यह भी आख्यान मिलता है कि शनि के प्रकोप से ही अपने राज्य को
घोर दुर्भिक्ष से बचाने के लिये राजा दशरथ उनसे मुकाबला करने पहुंचे तो उनका पुरुषार्थ
देख कर शनि ने उनसे वरदान मांगने के लिये कहा। राजा दशरथ ने विधिवत स्तुति कर उसे प्रसन्न
किया। पद्म पुराण में इस प्रसंग का सविस्तार वर्णन है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में शनि 
ने जगत जननी पार्वती को बताया है कि मैं सौ जन्मों तक जातक की करनी का फ़ल भुगतान करता
हूं। एक बार जब विष्णुप्रिया लक्ष्मी ने शनि से पूछा कि तुम क्यों जातकों को धन हानि
करते हो, क्यों सभी तुम्हारे प्रभाव से प्रताडित रहते हैं, तो शनि महाराज ने उत्तर 
दिया, “मातेश्वरी, उसमे मेरा कोई दोष नही है, परमपिता परमात्मा ने मुझे तीनो लोकों 
का न्यायाधीश नियुक्त किया हुआ है, इसलिये जो भी तीनो लोकों के अंदर अन्याय करता है,
उसे दण्ड देना मेरा कर्तव्‍य है”।

एक आख्यान और मिलता है, कि किस प्रकार से ऋषि अगस्त ने जब शनि देव से प्रार्थना की 
थी, तो उन्होंने राक्षसों से उनको मुक्ति दिलवाई थी। जिस किसी ने भी अन्याय किया, उनको
ही उन्होने दंड दिया, चाहे वह भगवान शिव की अर्धांगिनी सती रही हों, जिन्होने सीता 
का रूप रखने के बाद बाबा भोले नाथ से झूठ बोलकर अपनी सफ़ाई दी और परिणाम में उनको अपने
ही पिता की यज्ञ में हवन कुंड मे जल कर मरने के लिये शनि देव ने विवश कर दिया, अथवा
राजा हरिश्चन्द्र रहे हों, जिनके दान देने के अभिमान के कारण सप्तनीक बाजार में बिकना
पडा और,शमशान की रखवाली तक करनी पडी, या राजा नल और दमयन्ती को ही ले लीजिये, जिनके
तुच्छ पापों की सजा के लिये उन्हे दर दर का होकर भटकना पडा, और भुनी हुई मछलियां तक
पानी मै तैर कर भाग गईं, फ़िर साधारण मनुष्य के द्वारा जो भी मनसा, वाचा, कर्मणा, पाप
कर दिया जाता है वह चाहे जाने मे किया जाय या अन्जाने में, उसे भुगतना तो पडेगा ही।

मत्स्य पुराण में महात्मा शनि देव का शरीर इन्द्र कांति की नीलमणि जैसी है, वे गिद्ध
पर सवार है, हाथ मे धनुष बाण है एक हाथ से वर मुद्रा भी है, शनि देव का विकराल रूप 
भयावना भी है। शनि पापियों के लिये हमेशा ही संहारक हैं। पश्चिम के साहित्य मे भी अनेक
आख्यान मिलते हैं। भारत में भी शनि देव के अनेक मन्दिर हैं, जैसे शिंगणापुर, वृंदावन
के कोकिला वन, ग्वालियर के शनिश्चराजी, दिल्ली तथा अनेक शहरों मे महाराज शनि के मन्दिर
हैं।

### **शनि की पहचान (Shani Significance)**

जातक को अपने जन्म दिनांक को देखना चाहिये, यदि शनि चौथे, छठे, आठवें, बारहवें भाव 
मे किसी भी राशि में विशेषकर नीच राशि में बैठा हो, तो निश्चित ही आर्थिक, मानसिक, 
भौतिक पीडायें अपनी महादशा, अन्तर्दशा, में देगा, इसमे कोई सन्देह नही है, समय से पहले
यानि महादशा, अन्तर्दशा, आरम्भ होने से पहले शनि के बीज मंत्र का अवश्य जाप कर लेना
चाहिये.ताकि शनि प्रताडित न कर सके, और शनि की महादशा और अन्तर्दशा का समय सुख से बीते.
याद रखें अस्त शनि भयंकर पीडादायक माना जाता है, चाहे वह किसी भी भाव में क्यों न हो।

### **शनि सम्बन्धी व्यापार और नौकरी (Saturn related Job/Career)**

काले रंग की वस्तुयें, लोहा, ऊन, तेल, गैस, कोयला, कार्बन से बनी वस्तुयें, चमडा, मशीनों
के पार्ट्स, पेट्रोल, पत्थर, तिल और रंग का व्यापार शनि से जुडे जातकों को फ़ायदा देने
वाला होता है। चपरासी की नौकरी, ड्राइवर, समाज कल्याण की नौकरी नगर पालिका वाले काम,
जज, वकील, राजदूत आदि वाले पद शनि की नौकरी मे आते हैं।

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### **काशी में ग्रहत्व प्राप्त किया**

स्कन्द पुराण में काशी खण्ड में वृतांत आता है, कि छाया सुत श्री शनिदेव ने अपने पिता
भगवान सूर्य देव से प्रश्न किया कि हे पिता! मै ऐसा पद प्राप्त करना चाहता हूँ, जिसे
आज तक किसी ने प्राप्त नही किया, हे पिता ! आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना बडा हो,
मुझे आपसे अधिक सात गुना शक्ति प्राप्त हो, मेरे वेग का कोई सामना नही कर पाये, चाहे
वह देव, असुर, दानव, या सिद्ध साधक ही क्यों न हो.आपके लोक से मेरा लोक सात गुना ऊंचा
रहे.दूसरा वरदान मैं यह प्राप्त करना चाहता हूँ, कि मुझे मेरे आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण
के प्रत्यक्ष दर्शन हों, तथा मै भक्ति ज्ञान और विज्ञान से पूर्ण हो सकूं.शनिदेव की
यह बात सुन कर भगवान सूर्य प्रसन्न तथा गदगद हुए, और कह, बेटा ! मै भी यही चाहता हूँ,
के तू मेरे से सात गुना अधिक शक्ति वाला हो.मै भी तेरे प्रभाव को सहन नही कर सकूं, 
इसके लिये तुझे तप करना होगा, तप करने के लिये तू काशी चला जा, वहां जाकर भगवान शंकर
का घनघोर तप कर, और शिवलिंग की स्थापना कर, तथा भगवान शंकर से मनवांछित फ़लों की प्राप्ति
कर ले.शनि देव ने पिता की आज्ञानुसार वैसा ही किया, और तप करने के बाद भगवान शंकर के
वर्तमान में भी स्थित शिवलिंग की स्थापना की, जो आज भी काशी-विश्वनाथ के नाम से जाना
जाता है, और कर्म के कारक शनि ने अपने मनोवांछित फ़लों की प्राप्ति भगवान शंकर से की,
और ग्रहों में सर्वोपरि पद प्राप्त किया।

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###  **शनि की साढे साती (Shani Sadhesati)**

ज्योतिष के अनुसार शनि की साढेसाती की मान्यतायें तीन प्रकार से होती हैं, पहली लगन
से दूसरी चन्द्र लगन या राशि से और तीसरी सूर्य लगन से, उत्तर भारत में चन्द्र लगन 
से शनि की साढे साती की गणना का विधान प्राचीन काल से चला आ रहा है। इस मान्यता के 
अनुसार जब शनिदेव चन्द्र राशि पर गोचर से अपना भ्रमण करते हैं तो साढेसाती मानी जाती
है।

इसका प्रभाव राशि में आने के तीस माह पहले से और तीस माह बाद तक अनुभव होता है। साढेसाती
के दौरान शनि जातक के पिअले किये गये कर्मों का हिसाब उसी प्रकार से लेता है, जैसे 
एक घर के नौकर को पूरी जिम्मेदारी देने के बाद मालिक कुछ समय बाद हिसाब मांगता है, 
और हिसाब में भूल होने पर या गल्ती करने पर जिस प्रकार से सजा नौकर को दी जाती है उसी
प्रकार से सजा शनि देव भी हर प्राणी को देते हैं।

यही नही जिन लोगों ने अच्छे कर्म किये होते हैं तो उनको साढेशाती पुरस्कार भी प्रदान
करती है, जैसे नगर या ग्राम का या शहर का मुखिया बना दिया जाना आदि.शनि की साढेसाती
के आख्यान अनेक लोगों के प्राप्त होते हैं, जैसे राजा विक्रमादित्य, राजा नल, राजा 
हरिश्चन्द्र, शनि की साढेसाती संत महात्माओं को भी प्रताडित करती है, जो जोग के साथ
भोग को अपनाने लगते हैं। हर मनुष्य को तीस साल मे एक बार साढेसाती अवश्य आती है, यदि
यह साढे साती धनु, मीन, मकर, कुम्भ राशि मे होती है, तो कम पीडाजनक होती है।

यदि यह साढेसाती चौथे, छठे, आठवें, और बारहवें भाव में होगी, तो जातक को अवश्य दुखी
करेगी, और तीनो सुख शारीरिक, मानसिक, और आर्थिक को हरण करेगी.इन साढेसातियों में कभी
भूलकर भी “नीलम” नही धारण करना चाहिये, यदि किया गया तो वजाय लाभ के हानि होने की पूरी
सम्भावना होती है। कोई नया काम, नया उद्योग, भूल कर भी साढेसाती में नही करना चाहिये,
किसी भी काम को करने से पहले किसी जानकार ज्योतिषी से जानकारी अवश्य कर लेनी चाहिये।

यहां तक कि वाहन को भी भूलकर इस समय में नही खरीदना चाहिये, अन्यथा वह वाहन सुख का 
वाहन न होकर दुखों का वाहन हो जायेगा। शनि जब भी चार, छ:, आठ, बारह मे विचरण करेगा,
तो उसका मूल धन तो नष्त होगा ही, कितना ही जतन क्यों न किया जाये.और शनि के इस समय 
का विचार पहले से कर लिया गया है तो धन की रक्षा हो जाती है। यदि सावधानी नही बरती 
गई तो मात्र पछतावा ही रह जाता है। अत: प्रत्येक मनुष्य को इस समय का शनि आरम्भ होने
के पहले ही जप तप और जो विधान हम आगे बातायेंगे उनको कर लेना चाहिए।

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### **अंक शास्त्र में शनि (Saturn Numerology)**

ज्योतिष विद्याओं मे अंक विद्या भी एक महत्व पूर्ण विद्या है, जिसके द्वारा हम थोडे
समय में ही प्रश्न कर्ता का स्पष्ट उत्तर दे सकते हैं, अंक विद्या में 8 का अंक शनि
को प्राप्त हुआ है। शनि परमतपस्वी और न्याय का कारक माना जाता है, इसकी विशेषता पुराणों
में प्रतिपादित है। आपका जिस तारीख को जन्म हुआ है, गणना करिये, और योग अगर 8 आये, 
तो आपका अंकाधिपति शनिश्चर ही होगा.जैसे- 8, 17, 26 तारीख आदि। यथा-17 = 1+7 = 8, 26
= 2+6 = 8.

### **अंक 8 की ज्योतिषीय परिभाषा (Numerology for 8)**

अंक आठ वाले जातक धीरे धीरे उन्नति करते हैं, और उनको सफ़लता देर से ही मिल पाती है।
परिश्रम बहुत करना पडता है, लेकिन जितना किया जाता है उतना मिल नही पाता है, जातक वकील
और न्यायाधीश तक बन जाते हैं, और लोहा, पत्थर आदि के व्यवसाय के द्वारा जीविका भी चलाते
हैं। दिमाग हमेशा अशान्त सा ही रहता है, और वह परिवार से भी अलग ही हो जाता है, साथ
ही दाम्पत्य जीवन में भी कटुता आती है। अत: आठ अंक वाले व्यक्तियों को प्रथम शनि के
विधिवत बीज मंत्र का जाप करना चाहिये।

तदोपरान्त साढे पांच रत्ती का नीलम धारण करना चाहिये.ऐसा करने से जातक हर क्षेत्र में
उन्नति करता हुआ, अपना लक्ष्य शीघ्र प्राप्त कर लेगा.और जीवन में तप भी कर सकेगा, जिसके
फ़लस्वरूप जातक का इहलोक और परलोक सार्थक होंगे।

शनि प्रधान जातक तपस्वी और परोपकारी होता है, वह न्यायवान, विचारवान, तथा विद्वान भी
होता है, बुद्धि कुशाग्र होती है, शान्त स्वभाव होता है, और वह कठिन से कठिन परिस्थति
में अपने को जिन्दा रख सकता है। जातक को लोहा से जुडे वयवसायों मे लाभ अधिक होता है।
शनि प्रधान जातकों की अन्तर्भावना को कोई जल्दी पहिचान नही पाता है।

जातक के अन्दर मानव परीक्षक के गुण विद्यमान होते हैं। शनि की सिफ़्त चालाकी, आलसी,
धीरे धीरे काम करने वाला, शरीर में ठंडक अधिक होने से रोगी, आलसी होने के कारण बात 
बात मे तर्क करने वाला, और अपने को दंड से बचाने के लिये मधुर भाषी होता है। दाम्पत्यजीवन
सामान्य होता है। अधिक परिश्रम करने के बाद भी धन और धान्य कम ही होता है।

जातक न तो समय से सोते हैं और न ही समय से जागते हैं। हमेशा उनके दिमाग में चिन्ता 
घुसी रहती है। वे लोहा, स्टील, मशीनरी, ठेका, बीमा, पुराने वस्तुओं का व्यापार, या 
राज कार्यों के अन्दर अपनी कार्य करके अपनी जीविका चलाते हैं। शनि प्रधान जातक में 
कुछ कमिया होती हैं, जैसे वे नये कपडे पहिनेंगे तो जूते उनके पुराने होंगे, हर बात 
में शंका करने लगेंगे, अपनी आदत के अनुसार हठ बहुत करेंगे, अधिकतर जातकों के विचार 
पुराने होते हैं।

उनके सामने जो भी परेशानी होती है सबके सामने उसे उजागर करने में उनको कोई शर्म नही
आती है। शनि प्रधान जातक अक्सर अपने भाई और बान्धवों से अपने विचार विपरीत रखते हैं,
धन का हमेशा उनके पास अभाव ही रहता है, रोग उनके शरीर में मानो हमेशा ही पनपते रहते
हैं, आलसी होने के कारण भाग्य की गाडी आती है और चली जाती है उनको पहिचान ही नही होती
है, जो भी धन पिता के द्वारा दिया जाता है वह अधिकतर मामलों में अपव्यय ही कर दिया 
जाता है। अपने मित्रों से विरोध रहता है। और अपनी माता के सुख से भी जातक अधिकतर वंचित
ही रहता है।

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