वर्ष 1997 में जब हमने ज्योतिष पढ़ना और सीखना शुरू किया, तब बहुत अधिक संसाधन नहीं थे। पुस्तकें भी नहीं मिलती थी और कुण्डली बनाने के सॉफ्टवेयर भी पहुंच में नहीं थे। कोई 2002 में पहली बार पर्सनल कम्प्यूटर हाथ लगा था, 32 एमबी मैमोरी और 2 जीबी हार्ड डिस्क का। उसमें पााराशर लाइट 2000 सॉफ्टवेयर की क्रैक कॉपी चलाते थे।
शुरूआत बड़ी अजीब थी, ऊट पटांग पुस्तकें लेकर आते, पहले प्रिडिक्शन करते और बाद में उसके स्रोत तलाशने का प्रयास करते। दैव योग से हमारे फलादेश सटीक पड़ते तो कभी नीचा नहीं देखना पड़ा, लेकिन कालांतर में ज्यों ज्यों सीखते गए, तब पता चला कि बिना सीखे भी हमारी गाड़ी चल रही थी। बाद में गुरु मिले और उन्होंने तराशना शुरू किया तो पता चला कि बिना क्रम के सीखने का नुकसान यह हुआ कि पूरे यात्रा में गढ्ढे ही गढ्ढे थे। उम्र कम थी और सीखने का उत्साह अधिक था, तो कमी की पूर्ति हो गई।
आज मोबाइल में ही हर प्रकार के संसाधन उपलब्ध हैं। ऐसे में हर किसी के लिए ज्योतिष सीखना आसान हो गया है। बाजार में पुस्तकें उपलब्ध हैं और सॉफ्टवेयर मोबाइल में। हर परिवार के कम से कम एक सदस्य को ज्योतिष का अच्छा ज्ञान होना चाहिए।
ज्योतिषी के लिए ज्योतिष व्यवसाय हो सकता है, लेकिन एक आम कामकाजी पुरुष अथवा सजग गृहिणी के लिए यह गृहस्थी का आवश्यक टूल है।
ज्योतिष अभ्यास के शुरुआती दिनों में मेरे सबसे कठिन जातक मारवाड़ी बनिए हुआ करते थे, बीकानेर में मुख्यतया तीन तरह के बनिए हैं ओसवाल यानी जैन, माहेश्वरी और अग्रवाल। इन तीनों तरह के बनियों में एक चीज़ कॉमन है कि इन्हें स्वयं ज्योतिष का ठीक ठाक ज्ञान होता है। ख़ासकर पंचांग, गोचर और अपनी कुंडली का उन्हें भान होता है। ग्रहों राशियों और भावों की आरंभिक समझ होती है।
सामान्य तौर पर ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं, तो अगर मेरे जैसा नया ज्योतिषी भी जाता है यो उसका अपमान करने के बजाय उसे अधिक सीखने के लिए प्रेरित करते हैं। इसी प्रकार नए ज्योतिषी बनते हैं। मुझे भी कई जातक ऐसे मिले जिन्हें ज्योतिष की अच्छी जानकारी थी, पहले तो जो मैंने कहा चुपचाप सुनते रहे फिर क्रॉस क्वेश्चन किए तब मुझे समझ आया कि सेठ जी अच्छी पकड़ रखते हैं।
सामान्य लोगों के लिए संभवतः ज्योतिष इतना उपयोगी टूल भले ना हो लेकिन भाग्य के तीव्र रथ पर सवार लोगों के लिए यह आवश्यक टूल सिद्ध होता है।

