सामान्‍य तौर पर कहा जाता है कि झूठ के पांव नहीं होते, इसका अर्थ होता है कि अगर कोई झूठी बात प्रसारित की गई है तो शीघ्र ही उसका पर्दाफाश हो जाएगा। लेकिन एक झूठ ऐसा है कि आज 95 साल से न केवल चल रहा है, बल्कि बहुत अच्‍छा फल फूल रहा है। जैसे जैसे प्रचार तंत्र अधिक सशक्‍त होते जा रहे हैं, यह झूठ भी अधिक तेजी से अपनी पकड़ बनाता जा रहा है। मैं बात कर रहा हूं दैनिक फलादेशों की…

दरअसल यह बात केवल दैनिक फलादेश ही नहीं बल्कि साप्‍ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक और सामूहिक वार्षिक फलादेशों पर भी लागू होती है। कभी गौर किया है कि ये फलादेश कभी 21 दिन या 40 दिन के क्‍यों नहीं होते? कभी गौर किया है 8 अरब लोगों के भविष्‍य को क्‍या 12 स्‍पष्‍ट भागों में बांटा जा सकता है? ज्‍योतिष की किस शाखा में दैनिक फलादेश निकालने की विधि दी गई है? जब इस प्रकार के फलादेशों की उत्‍पत्ति के बारे में जानेंगे तो हमें पता चलेगा कि क्‍यों यह पद्धति इसी प्रकार से है।

कहानी शुरू होती है 1930 के ग्रेट डिप्रेशन से। अमरीका मंदी की महामारी को झेल रहा था। हालात इतने बुरे थे कि लोग आटे की थैली के बचे हुए कपड़ों से बच्‍चों के वस्‍त्र सिला करते थे। हर बात में मायूसी थी और कहीं आगे बढ़ने का रास्‍ता नहीं मिल रहा था। ऐसे में सुदूर पूर्व यानी भारत से वहां पहुंची एक प्राचीन विधा का दोहन करने का निश्‍चय दो समाचारपत्रों ने किया। पहले का नाम था वाशिंगटन पोस्‍ट और दूसरे का नाम था न्‍यूयार्क टाइम्‍स। इन दोनों अखबारों ने जनता का मोरल बूस्‍ट करने के कई प्रयोग किए, उनमें से सबसे शक्तिशाली प्रयोग सिद्ध हुआ दैनिक फलादेश। यह परफेक्‍ट रेसिपी थी। अव्‍वल तो वहां कोई नहीं जानता था कि दैनिक फलादेश कैसे निकाले जाते हैं। दूसरा भारत को पूरी दुनिया ज्ञान के खजाने के रूप में जानती थी, सो भारत से गई विधा पर लोगों ने आंख मूंदकर भरोसा किया। तीसरे यह विधा पूरी जनता को एक साथ प्रभावित करती थी। चौथा चूंकि लिखने के लिए किसी प्रकार का आधार नहीं था, तो लिखने की पाबंदी भी नहीं थी, सो ऐसे फलादेश लिखे जाते थे, जिससे जनता का मोरल बूस्‍ट किया जा सके।

वास्‍तव में यह ट्रिक काम भी कर गई। सड़कों और रेल लाइन पर काम करने वालों से लेकर वॉल स्‍ट्रीट के ब्रोकर तक सुबह उठने पर सबसे पहले दूसरे पेज पर छपा अपना राशिफल पढ़ते और पूरी ताकत से अपने काम में जुट जाते। इस काम के लिए दोनों समाचारपत्रों ने किसी भी ज्‍योतिषी की सेवा नहीं ली, बल्कि ऐसे लोगों को लिखने के काम में लगाया गया जो गोलमाल भाषा में लिखे। जिसे जो समझना हो समझे, लेकिन अंतत: मोरल बूस्‍ट होना चाहिए। एक तरफ लोगों का खोया आत्‍मविश्‍वास लौट रहा था, दूसरी तरफ समाचारपत्रों की बिक्री में इससे जबरदस्‍त इजाफा हुआ।

कालांतर में अमरीका में मंदी का दौर बीत गया। बीस या तीस साल तक लगातार छपा दैनिक फलादेश का कॉलम अब समाचारपत्रों के लिए गले की हड्डी बन चुका था। दोनों समाचारपत्रों ने कई बार प्रयास किया कि कॉलम को कालांतर में बंद कर दिया जाए, लेकिन पाठक वर्ग इसका आदी हो चुका था। परिणाम यह हुआ कि दोनों अखबार चाहकर भी इसे बंद नहीं कर पाए। समाचारपत्रों का यह स्‍थाई कॉलम बन गया। कई बार विज्ञान को आधार बनाकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास भी किया गया। कार्ल सीगन जैसे विज्ञानवादी कट्टरपंथी को इस काम में झोंका गया। उन्‍होंने ज्‍योतिष के खिलाफ लंबे समय तक मुहिम चलाए रखी, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला, लोग पहले की तरह ही अपने दैनिक फलादेश पढ़ते रहे, जो एक झूठ की बुनियाद पर रखे गए थे।

दोनों ही प्रमुख अखबार थे, सो दूसरे अन्‍य अखबारों ने भी इसी सिलसिले को शुरू कर‍ दिया। जिस प्रकार आजकल सूडोकू कॉलम स्‍थाई कॉलम है, इसी प्रकार दैनिक फलादेश का भी स्‍थाई कॉलम बना रहा। कालांतर में साप्‍ताहिक, पाक्षिक और मासिक मैग्‍जींस ने भी इसी प्रकार यह कॉलम शुरू कर दिया। यह माने जाने लगा कि ज्‍योतिष कॉलम बिक्री बढ़ाने में मददगार है। वर्ष 1947 में देश के आजाद होने के बाद जो समाचारपत्र चार पेज से अधिक बड़े थे, उन्‍होंने भी विदेशी अखबारों की तर्ज पर ज्‍योतिष का कॉलम देना शुरू कर दिया। अंतर बस इतना था कि भारतीय समाचारपत्रों और मैग्‍जींस ने इस काम के लिए ज्‍योतिषी नामधारी व्‍यक्तियों को लेखक के रूप में प्रस्‍तुत किया, ताकि आम जनता का विश्‍वास बनाया जा सके। शुरूआती दौर में परंपरागत ज्‍योतिषियों को यह समझ में भी नहीं आया कि ताजिक नीलकंठी के जरिए मुंथा के जो व्‍यक्तिगत वार्षिक फलादेश निकाले जाते हैं, उसे किस प्रकार दैनिक फलादेश तक लाया जाए। अगर नक्षत्रों के आधार पर भी संपत और विपत के लक्षणों के आधार पर फलादेश किए जाएं तो दैनिक का कोण नहीं बन सकता था।

प्रत्‍येक ज्‍योतिषी ने अपने तरीके से दैनिक फलादेश निकालने की रीति बनाई। अगर गोचर का भी सहारा लिया जाए तो प्रत्‍येक नक्षत्र करीब चौबीस घंटे का होता है, लेकिन यह चौबीस घंटे आज के सूर्योदय से कल के सूर्योदय तक नहीं होते। कभी नक्षत्र बीच दिन में बदल सकता है और कभी पूरे दिन चल सकता है। ऐसे में गोचर की सबसे छोटी इकाई नक्षत्र इस्‍तेमाल नहीं की जा सकती थी। अगर बात करें चंद्रमा के राशि परिवर्तन की, तो इसमें कम से कम सवा दो दिन का समय लगता है, ऐसे में इसे भी इस्‍तेमाल नहीं किया जा सकता। अगर सबसे तेज चलने वाला ग्रह चंद्रमा भी चौबीस घंटे के गोचर में फलादेश उपलब्‍ध नहीं करवा सकता था, तो उससे बड़े ग्रहों से तो उम्‍मीद नहीं ही की जा सकती है। सूर्य, बुध और शुक्र करीब महीने भर में, मंगल डेढ़ महीने में, गुरु एक साल में और शनि तो ढाई साल में राशि गोचर करता है। ऐसे में गोचर के आधार पर दैनिक फलादेश किसी भी सूरत में नहीं बनाए जा सकते।

अपने प्रिंट पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर बता सकता हूं कि समाचारपत्र में छपने वाले फलादेश आगामी करीब एक महीने तक पहले ही लिख दिए जाते हैं। मुख्‍यालय से एक फाइल सभी केन्‍द्रों तक जाती हैं, वहां इन फलादेशों को ज्‍यों का त्‍यों चिपका दिया जाता था। अब कभी कभार यह समस्‍या आती कि किसी तकनीकी कारण से फलादेश की फाइल नहीं आती, तो पेज मेकर अपनी इच्‍छा से दो चार महीने पहले के किसी दैनिक फलादेश की फाइल उठाकर ज्‍यों की त्‍यों चिपका देता। किसी को पता भी नहीं चलता था।

जो लोग ज्‍योतिष विषय का मजाक बनाते हैं, उनमें से अधिकांश इन्‍हीं दैनिक फलादेशों का हवाला देते नजर आते हैं, जबकि परंपरागत भारतीय ज्‍योतिष के किसी भी शास्‍त्र में दैनिक फलादेश निकालने की रीति नहीं दी गई है। न पाराशर ने, न वराहमिहीर ने, न गर्ग ने और न किसी अन्‍य प्रमुख ज्‍योतिषी ने दैनिक फलादेश का नाम भी लिया है। अमरीकी मंदी की मार से बचाने के लिए ज्‍योतिष के नाम पर शुरू हुआ फर्जीवाड़ा आज लगभग सौ साल बाद भी चल रहा है। आज यूट्यूब शॉर्ट्स, इंस्‍टाग्राम और फेसबुक तक पर यह बकायदा जारी है। मेरे पुराने जातक जानते हैं कि मैं न तो दैनिक फलादेश की बात करता हूं और न ही इसका समर्थन करता हूं। हां, वार्षिक फलादेश निकालकर देता हूं, यह व्‍यक्तिगत कुण्‍डली पर आधारित होता है। इसमें भी मेरा मुख्‍य प्रयास तात्‍कालिक दशा, अंतरदशा और प्रत्‍यंतर पर आधारित होता है। इसमें न केवल अधिक सटीकता होती है, बल्कि जातक की सही सहायता भी हो पाती है। इसका अंतराल एक वर्ष हो जरूरी नहीं, यह फलादेश 11 महीने के कभी हो सकते हैं और सवा साल के भी।

ज्‍योतिषी सिद्धार्थ जगन्‍नाथ जोशी
बीकानेर