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महाराज की कथा के बाद अब मैं बताना चाह रहा हूं बाबू मास्‍टर के बारे में। चाहता तो था कि साथ ही लिख दूं लेकिन इससे पोस्‍ट बहुत लम्‍बी हो जाती। अब बात बाबू मास्‍टर की। लम्‍बा चौड़ा शरीर, घोड़े जैसे दांत, सिर मुंडाया हुआ और पीछे मोटी चोटी। और वर्णन करूंगा तो पहचान पुख्‍ता हो जाएगी।

हां, तो बाबू मास्‍टर से मिलना कुछ इस तरह हुआ कि वे बीकानेर आए हुए थे। उनके सो कॉल्‍ड गुरूजी बीकानेर के ही हैं। हालांकि उनके गुरूजी का ज्‍योतिष के बजाय अध्‍यात्‍म में अधिक रुझान है। क्‍या कहें, बाबू मास्‍टर जिन्‍हें गुरुजी कहता है उनकी छवि इतनी बड़ी है कि लगता है बाबू मास्‍टर ने केवल अपनी छतरी पुख्‍ता करने के लिए उनका नाम इस्‍तेमाल किया। अब उनके गुरू ऐसा क्‍यों करने दे रहे थे इसका मुझे अंदाजा नहीं है।

मैं अपने एक रिश्‍तेदार के साथ उनसे मिलने के लिए पहुंचा। हमारी मुलाकात से पहले बाबू मास्‍टर को बताया गया था कि एक ऐसा मरीज आ रहा है जो बिल्‍कुल सुस्‍त है और कुछ काम नहीं करना चाहता। ज्‍योतिष के नाम पर निठल्‍ला बैठा है। कहता है समय खराब है सो कुछ करना बेकार है। वह रोगी साथ ही था। हम जब उनके आश्रमनुमा स्‍थान पर पहुंचे तो बाबू मास्‍टर ने मुझे देखते ही पहचान लिया और अपनी दमदार आवाज में झिड़कने लगे कि क्‍यों ऐसी क्‍या समस्‍या है कि सब काम छोड़कर बैठे हो। मैं सकपका गया, लेकिन हाथों-हाथ संभल गया। मैंने बताया कि हम इसे दिखाने लाए हैं मैं तो नौकरी करता हूं। बाबू ने पूछा क्‍या नौकरी करता है। मैंने कहा पत्रकार हूं। अब बाबू ने पलटवार किया कहा तेरी नौकरी तो कुछ नहीं करने के बराबर ही है।

मैंने खून का घूंट पी लिया। कुछ सीखने की गरज जो थी। अब शुरू हुआ ईलाज का क्रम। बाबू मास्‍टर ने रोगी से नाम पता और डेट ऑफ बर्थ पूछी। रोगी बता रहा था और बाबू के दो असिस्‍टेंट नोट कर रहे थे। रोगी बोल रहा था कि बाबू ने अपने दो असिस्‍टेंट से चर्चा करनी शुरू कर दी। बातचीत में लगातार विदेशी शब्‍द आ रहे थे। कुछ देर की चर्चा के बाद बाबू रोगी की ओर मुड़े और बोले कोई समस्‍या नहीं है। यह लड़का कुछ काम नहीं करना चाहता इसलिए ऐसा कहता है। इसका भाग्‍य प्रबल है। हमने उन्‍हें बताया नहीं था कि जिस रोगी को लाया गया है वह स्किजोफ्रीनिया का पेशेंट है। सो उनके इस कथन के बाद मैंने बता दिया।

अब बाबू बिफर गए। बोले मुझे सिखाता है क्‍या। मैं सहमकर चुप हो गया। कुछ देर बाद रोगी को एक मंत्र देकर पीछे भेज दिया और कहा जब तक न कहूं उठना मत। इसके बाद बातचीत का दौर शुरू हुआ। इतनी देर में बाबू को समझ आया कि मैं ज्‍योतिष में रुचि रखता हूं। सो उन्‍होंने एस्‍ट्रोलॉजिकल टर्म इस्‍तेमाल करनी ही बंद कर दी। अपनी हर बात को थाई अंक पद्धति से शुरू किया और वहीं पर खत्‍म कर दिया। मैं मूर्खों की तरह बस मुंह बांए बैठा रहा।

बातचीत के बीच एक के बाद एक, दो फोन आए। बाबू ने बिना जातक से प्रश्‍न पूछे इलाज बता दिया और फोन रख दिया। बाबू के व्‍यवहार से अब तक मैं पूरी तरह हतोत्‍साहित हो चुका था लेकिन फोन कॉल के बाद तो मैं हैरान था। अपनी रौ में लगातार बोल रहे बाबू को मैंने टोका कि आपने बिना समस्‍या पूछे समाधान कैसे बता दिया। उन्‍होंने कहा कि यह तो मेरा काम है। इसके बाद वे अपने कामों का वर्णन करते रहे। एक इंटरनेश्‍ाल बैंक में एनालिस्‍ट का पद छोड़ चुके थे, इसके बाद एक फाइनेंस कंसल्‍टेंसी फर्म खोली वह भी बंद कर दी। इसके बाद मार्केटिंग का काम किया और वह भी छोड़ दिया।

आखिरी बार जिस अंतरराष्‍ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहे थे उसमें थाईलैण्‍ड में पोस्‍टेड थे। वहां थाई अंक ज्‍योतिष सीखी और नौकरी छोड़ पूरी तरह ज्‍योतिष में लग गए। यह सारी बातें उन्‍होंने ने ही बताई है। मैंने आज तक वापस इसकी पुष्टि नहीं की है। खैर मैंने कहा कि ज्‍योतिष की ऐसी कौनसी विद्या है जिसमें बिना जातक को जाने, बिना उससे सवाल जवाब किए उसके बारे में इतना स्‍पष्‍ट बताया जा सकता है। थोड़ी देर बाद तो मैंने दावा भी कर दिया कि यह ज्‍योतिष ही नहीं है। बाबू हैरान करने पर ही तुले हुए थे।

उन्‍होंने कहा हां मैं ज्‍योतिष नहीं करता। मैंने कहा तो क्‍या करते है। बाबू ने कहा मैं लोगों को मूर्ख बनाता हूं। मेरा धंधा मूर्ख बनाने का ही है। यह जवाब मैं पहले सुन चुका था। अब दूसरी बार सुन रहा था। ज्‍योतिष के क्षेत्र में कई साल तक लोगों के सम्‍पर्क में रहने और नौकरी के कारण काफी पॉलिश भी हो चुका था। सो मैं संयत बना रहा। मैंने अध्‍यात्मिक गुरू के आश्रम की आड़ लेकर पूछा कि आपको संतुष्टि मिल जाती है लोगों को ऐसे मूर्ख बनाकर। तो बाबू बोले मैं खुद थोड़े ही जाता हूं मूर्ख बनाने के लिए। वे खुद आते हैं। और सही पूछो तो लोग मूर्ख ही बनना चाहते हैं। आप उन्‍हें समस्‍याओं का ठोस कारण बताओगे तो वे पचा नहीं पाएंगे।

एक आम आदमी की समस्‍या है कि वह गलतियां खुद करता है और उसका ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ना चाहता है। मैं तो बस उनकी मदद करता हूं। कभी ठीकरा वास्‍तु के सिर फूटता है, कभी ज्‍योतिष पर तो कभी किसी व्‍यक्ति विशेष पर। उन्‍होंने कहा तूं मुझे बस तडि़त चालक समझ सकता है। जो बिजली गिरने की दिशा तय करता है।

अब तक मैं हंसने लगा था। यह ईलाज का दूसरा व्‍यवहारिक तरीका था। पहले तरीके में महाराज प्रायश्चित करा रहे थे तो यहां बाबू मास्‍टर लोगों को लॉलीपॉप पकड़ा रहा था। दोनों ही लोगों ने ग्‍लानि को आवरण दिया और सहारा लिया ज्‍योतिष का। इन दोनों ही लोगों को अपने क्षेत्र का प्रकाण्‍ड विद्वान समझा जाता है।

महाराज ने सरकारी नौकरी छोड़ी और अब बड़ा घर और कार ले चुका है और बाबू मास्‍टर अपनी मल्‍टीनेशनल कंपनी की नौकरी में तीस से चालीस हजार रुपए तक की तनख्‍वाह पाता था अब रोज के पांच से सात हजार रुपए कमा रहा है। लोगों के दुख और तकलीफ जितने बढ़ते जाते हैं इन लोगों का रोजगार भी उसी गति से बढ़ रहा है। पता नहीं ईलाज किसका हो रहा है लेकिन इन दोनों ने एक बीमारी को कुछ समय के लिए तो खत्‍म कर ही दिया है। और वह बीमारी है उनकी खुद की गरीबी।