वर्ष 2011 की बात है, मैं पटियाला में अपने किसी जातक के घर बैठा था कि उसके किसी मित्र का चण्डीगढ़ से फोन आया। जातक ने बताया कि पंडिजी आए हुए हैं, कोई प्रश्न हो तो पूछ लो, मित्र ने केवल एक सवाल पूछा और बहुत स्पष्टता के साथ पूछा…
प्रश्न : पंडितजी, मेरे पास छह हजार करोड़ रुपए कब होंगे?
वर्ष 2012 की बात है, मुंबई में किसी पांच सितारा दफ्तर में बैठा था कि वहां मेरे किसी दिल्ली के मध्यवर्गीय क्लाइंट का फोन, जातक ने स्पष्ट कहा कि…
प्रश्न : पंडितजी इधर से लाख रुपए आते हैं, उधर से सवा लाख का खर्चा खड़ा हो जाता है।
मैंने बात पूरी कर फोन काटा और मुंबई वाले क्लाइंट से बात करने लगा, कुछ ही मिनट बाद क्लाइंट ने कहा…
प्रश्न : इस वित्तीय वर्ष में सौ करोड़ आए और एक सौ दस करोड़ का खर्च हो गया।
तीनों वाकयों में एक बात कॉमन है, जातक धन को लेकर परेशान थे, लेकिन मात्रा पूरी तरह असंगत थी।
यह बड़ा ही रोचक विषय है, जातक ज्योतिष के पास आकर बैठता है, हालांकि उसके पास धन की कमी नहीं है, वह गरीब नहीं है, वह प्रयास करता है, जातक को धन मिलता है, लेकिन उसे अनुमान नहीं है कि वह कितना दौड़ चुका है और कहां तक पहुंचना है, तब वह ज्योतिषी से पूछता है कि उसके भाग्य में कितना धन लिखा हुआ है? उसे कितना धन मिल सकता है।
रोचकता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि किसी भी ज्योतिष शास्त्र में एक भी सूत्र ऐसा नहीं है जो यह बताए कि जातक के पास ठीक ठीक कितना पैसा होगा। वास्तव में पैसा भी करीब सौ साल पुरानी अवधारणा है, उससे पूर्व तो सोना, चांदी, कीमती रत्न, पशु और जमीन से ही तय होता था कि कोई कितना धनवान है। कागजी रुपया आने के बाद इन सभी का मोल उस कागजी रुपए से तय किया जा सकता है।
आज की स्थिति में भले किसी जातक के पास पशुधन नहीं हो, लेकिन एक हजार पशुधन खरीदने जितना धन उसके बिस्तर के नीचे बने बॉक्स में हो सकता है। किसी जातक के पास जमीन नहीं है, यहां तक कि रहता भी फ्लैट में है, लेकिन उसके बैंक में इतने करोड़ रुपए हो सकते हैं कि सौ एकड़ का फार्म लेकर उस पर कोठी बनवा ले। यानी घर, जमीन, पशुधन, सोना चांदी आदि जैसी सभी वस्तुएं नोटों से अथवा बैंक में रखे धन से रिप्लेस हो चुकी हैं।
धन की मात्रा बताने में एक और चीज आड़े आती है, वह है मुद्रास्फीती। एक लिजेंडरी ज्योतिषी और लेखक हुए हैं देवकीनन्दन सिंह, उन्होंने अपनी पुस्तक ज्योतिष रत्नाकर में एक स्थान पर जातक के पास कितना धन हो सकता है उसकी कुछ गणनाएं बताई हैं, ये गणनाएं करीब सत्तर वर्ष पुरानी हैं, लगभग आजादी के आस पास की, सो उसमें कुछ लाख रुपए वाला जातक अत्यंत धनी हो जाता है। गणना से कुछ लाख तक ही पहुंचा जा सकता है, लेख के आखिर तक आते आते लेखक स्वयं कहने लगता है कि यह गणना का एक भोथरा तरीका है, देश काल और परिस्थिति के अनुसार हर ज्योतिषी के अपने अनुसार इसमें बदलाव करने होंगे। इस बात का आशय है कि जो ज्योतिषी यह बता रहा है कि फलां जातक के पास इतना धन होगा, उसका क्लासिकल ज्योतिष से कोई मतलब नहीं है, वह पूर्णतया अपने इंट्यूशन के दम पर ही बता पा रहा है।
फिर कैसे पता चले कि जातक के पास कितना धन होगा, इसका जवाब है कभी नहीं पता चल सकता कि जातक के पास कितना धन होगा, हां, इतना स्पष्ट बताया जा सकता है कि जातक धनवान होगा या नहीं। क्योंकि एक सीमा के बाद धन की मात्रा किसी भी घट बढ़ जाए, जातक के लिए वह अर्थहीन होता है।
वर्तमान में किसी जातक को सामान्य फाइनेंशियल फ्रीडम के लिए पांच करोड़ रुपए पर्याप्त हो सकते हैं, पचास करोड़ रुपए हो तो लग्जरी लाइफ जी सकता है, पांच सौ करोड़ रुपए होने पर सुपर रिच हो सकता है, उसके बाद क्या। अब इसके बाद किसी के पास पांच सौ करोड़ हो या पचास हजार करोड़, उसके लिए धन का कोई अर्थ बाकी नहीं रह जाता। घर वही रहेगा, खाना वही रहेगा, कपड़े वही रहेंगे, प्रसाधन सुविधाएं वही रहेंगी, इस बीच हो सकता है कि बहुत सी सामाजिक दौड़ भी उसके लिए बेमानी हो चुकी होगी। ऐसे में एक सीमा तक धन की बात की जा सकती है, लेकिन वह सीमा पार होने के बाद धन मात्र संख्या रह जाता है।
ज्योतिष से यह तो बताया जा सकता है कि धन के मामले में जातक संतुष्ट होगा, धनी होगा या खर्च अथवा ऋण के दबाव में जीवन यापन करेगा, लेकिन यह नहीं बताया जा सकता कि जातक के पास धन कितना होगा।
हो सकता है एक जातक के पास दो करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी हो, जिस पर दस दुकानें बनी हुई हों और उन दुकानों से आने वाले मासिक किराए से ही वह धनवानों जैसी जिंदगी जी रहा हो। ऐसे में एकमुश्त दस करोड़ की क्षमता वाला जातक भी किराए की आय वाले जातक की तुलना में अधिक असुरक्षित हो सकता है।
ज्योतिष के दृष्टिकोण से द्वितीय भाव स्थाई संपत्ति का होता है। इसमें पैतृक संपत्ति भी शामिल हैं और स्वयं जातक द्वारा अर्जित वह संपत्ति भी शामिल है जो स्थाई प्रकृति की होती है, जैसे जमीनें, सोना आदि। एकादश भाव आय और लाभ का होता है। नियमित आय और नियमित लाभ की अवस्थाएं एकादश के अनुकूल होने पर बनती हैं। दूसरे और एकादश भाव का संबंध अनुकूल हो तो अच्छी कमाई और संचय होता है। आठवां भाव अचानक लाभ का भाव है। इसका संबंध एकादश और द्वितीय से होने पर अचानक से बड़ी कमाई होती है और वह लंबी टिकती है। दूसरी ओर छठा भाव ऋण का होता है तथा द्वादश भाव खर्च का होता है अगर यह दोनों भाव एक्टिव हों तो जातक लगातार खर्च के दबाव में रहता है और ऋण से उन खर्च की पूर्ति करता है।
