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कब तक रहेगी कोरोना महामारी: ज्‍योतिषीय विश्‍लेषण (An Astrological Analysis on Corona Epidemic)

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An Astrological Analysis on Corona Epidemic

चीन के वुहान से शुरू हुए कोरोना महामारी (Corona Epidemic) के ताडंव के शुरूआती दौर में ही मेरे कुछ चिकित्‍सक मित्रों ने मुझसे पूछना शुरू कर दिया था कि ज्‍योतिषीय कोण से यह कोरोना महामारी का क्‍या प्रभाव होने वाला है। उस दौर में इसके पैनडैमिक (Corona Pandemic) होने की स्थिति नहीं बनी थी, लेकिन लक्षण दिखाई देने लगे थे। इसके बाद 22 मार्च को देशव्‍यापी लॉकडाउन (Nation Wide Lockdown) के बाद तो ऐसे प्रश्‍नों की बाढ़ सी ही आ गई। ऐसा केवल मेरे साथ ही नहीं हुआ, लगभग हर ज्‍योतिषी को इस सवाल से जूझना पड़ा है।

निजी तौर पर पहले दिन से मैंने स्‍पष्‍ट मना किया कि इस बीमारी के बारे में ज्‍योतिषीय कोण से कुछ नहीं कहा जा सकता। क्‍यों नहीं कहा जा सकता, इस पर चर्चा आगे करेंगे, लेकिन नहीं किया जा सकता, इतना तय है, इसके बावजूद बहुत से ज्‍योतिषी, जिनमें मेरे बहुत से मित्र भी शामिल हैं, बहुत जल्‍दी प्रश्‍नों के दबाव में टूट गए और कुछ भविष्‍यवाणियां कर दी। बहुत से ज्‍योतिषियों ने कोरोना काल में एक्‍सपोजर का लाभ लेने के प्रयास में अंट शंट फलादेश किए और बाद में सफाइयां देते रहे। केवल मेरे जैसे कुछ ढीठ और सपाट ज्‍योतिषी ही आज तक बचे हुए हैं, जिन्‍हें न तो इस संबंध में फलादेश करने की चिंता थी और न अब पुराने फलादेशों पर सफाई देने की। ऐसा क्‍यों हुआ?

कोरोना महामारी के शुरूआती दौर में ही बहुत से ज्‍योतिषियों ने इस रोग को राहु के साथ जोड़कर इसे अनिश्चित करार दे दिया। अगर कोई महामारी आ रही है, तो यह तय है कि अनिश्चितता लेकर आएगी, इसमें फलादेश जैसा कुछ नहीं था। असल फलादेश यह था कि यह महामारी किसे अपनी चपेट में लेगी, कितने समय तक रहेगी (When will Corona End) और इसकी रोकथाम के लिए ज्‍योतिष में कोई उपचार है या नहीं। इन सभी प्रमुख बिंदुओं को दरकिनार कर ज्‍योतिषी केवल अपने स्‍तर पर फलादेश करते रहे कि अमुक तिथि तक कोरोना का प्रभाव कम हो जाएगा या अमुक तिथि तक कोरोना का प्रभाव और बढ़ेगा। मेरी नजर में यह दोनों ही प्रकार के फलादेश मूलत: गलत हैं। आइए जानते हैं क्‍यों…

ज्‍योतिषी कोण से कोरोना क्‍या है?? (Astrological Analysis on Corona)

अगर रोग की दृष्टि से देखा जाए तो यह एक्‍यूट रेस्‍पीरेटरी डिस्‍ट्रेस सिंड्रोम है। यानी श्‍वसन तंत्र को जकड़ लेने वाला वायरल रोग। चूंकि यह वायरस नया है, अत: हमारे शरीर में इसके लिए पहले से कोई एंटीबॉडी नहीं है। तकनीकी तौर पर कोविड-19 (Covid-19 Virus) और राइनोवायरस यानी जुकाम के वायरस लगभग एक जैसे हैं, लेकिन चूंकि हमारे शरीर में जुकाम के वायरस के प्रति प्रतिरोधकता मौजूद है, ऐसे में हमें हर बार जुकाम के वायरस से जीवन का संघर्ष नहीं करना पड़ता। वहीं कोविड 19 (Covid 19) को लेकर हमारे शरीर में कोई प्रतिरक्षा प्रणाली विकसित नहीं है, तो यह स्‍वतंत्र रूप से शरीर को अंदर से नष्‍ट करता चला जाता है। ज्‍योतिष में किसी भी रोग को ग्रह के कारकत्‍व से देखा जाता है। यह कारकत्‍व हमें रोग की प्रकृति, शरीर में रोग का स्‍थान, प्रभावित होने वाले अंग और उसकी समयावधि से प्राप्‍त होते हैं। जैसे रक्‍त संबंधी विकार को सामान्‍य तौर पर मंगल से और त्‍वचा संबंधी विकार को बुध और शुक्र से देखा जाता है, हृदय रोग सूर्य से और नेत्र रोग सूर्य और चंद्रमा से देखे जाते हैं। यह बहुत मोटे तौर पर होता है।

प्रथमदृष्‍टया ऐसा दिखाई देता है कि कोविड 19 हमारे शरीर में नाक और मुख से लेकर फेफड़ों तक फैलने वाला रोग है। अब केवल श्‍वसन तंत्र पर ही इसका प्रभाव हो तो इसे पूरी तरह मिथुन राशि (Gemini Moonsign) के हवाले किया जा सकता था, लेकिन न तो केवल मिथुन राशि वाले प्रभावित थे और न ही केवल मिथुन राशि वाले जातक सुरक्षित थे। इसके अलावा मिथुन राशि तक ऐसा कोई संकट भी इस दौर में दिखाई नहीं दे रहा है।

कब तक रहेगा कोरोना का संकट (Corona End Date Prediction)

यहां केवल इतना सा क्‍लू है कि वर्तमान में राहु मिथुन राशि में विचरण (Rahu Transit in Gemini) कर रहा है। केवल इसे ही आधार बना दिया जाए तो हर 18 साल की अवधि में डेढ़ साल तक राहू मिथुन राशि में रहता है। अगर हम आंकड़ों के अनुसार देखें तो हर 18 साल में हमें श्‍वसन रोगों के ऐसे पैनडैमिक से गुजरना नहीं पड़ रहा है। अब राहु तो मिथुन में दिखाई दे ही रहा था, ऐसे में नौसिखिए ज्‍योतिषियों ने धड़ाधड़ राहु आधारित रोग और राहू आधारित फलादेश (Rahu Predictions) करने शुरू कर दिए।

अगर राहु का आधार भी मान लें तो यह राहू 7 मार्च 2019 को मिथुन राशि में आया था और 23 सितम्‍बर 2020 तक मिथुन राशि में ही बना रहने वाला है, जबकि कोरोना आउटबर्स्‍ट जनवरी 2020 में हुआ। विज्ञान शोध पत्रिकाओं की मानें तो अभी जनवरी 2021 तक इसके वैक्‍सीन या ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल आने की कोई गुंजाइश नहीं है। ऐसे में मिथुन के राहू को अकेले दोष देना संभव नहीं है।

मंडेन ज्‍योतिष (Mundane Astrology) की उपेक्षा का दुष्‍परिणाम

किसी भी अन्‍य विषय की तरह ज्‍योतिष विषय की भी कई शाखाएं हैं। ज्‍योतिष का गणित पक्ष समझने वाले अधिकांशत: पांचांगकर्ता होते हैं। इसके बाद फलित भाग आता है, इसकी भी कई शाखाएं हैं। लग्‍न कुण्‍डली को पढ़कर फलादेश करना जातक ज्‍योतिष है। मंडेन ज्‍योतिष मूल रूप से ज्‍योतिष की वह शाखा है जो ग्रह और नक्षत्रों के समष्टि स्‍तर के फलादेश करती है। देश के ज्‍योतिषियों में कोई विरला ही जातक कुण्‍डली से हटकर मंडेन ज्‍योतिष विषय का अध्‍ययन या शोध करता है। ज्‍योतिष के ज्ञात इतिहास में मंडेन ज्‍योतिष में पिछले 700 सालों में कुछ नया नहीं हुआ है। जबकि इस अवधि में राजतंत्र समाप्‍त होकर लोकतंत्र आ चुका है, देशों की सीमाएं बदल गई हैं, राजसेवा का अर्थ बदल चुका है, समष्टि की घटनाओं में कई बड़े घटक जुड़ चुके हैं, चाहे वह प्रदूषण के रूप में हो, कोयले के दोहन के रूप में हो, बांधों के रूप में हो, पैट्रोलियम के अतिशय भोग के रूप में हो, मौसम चक्र में परिवर्तन के रूप में हो अथवा विज्ञान एवं तकनीक से मिली नई जानकारियों के समावेश नहीं किए जाने के रूप में हो।

जिस विषय के प्रति इतने लंबे समय तक उपेक्षा बरती जा रही हो, उस विषय से फलादेश कैसे हासिल किए जा सकते हैं। शब्‍दावली के स्‍तर पर हो सकता है कि हमें लगे कि जातक कुण्‍डली में भी नौ ग्रह, बारह भाव, बारह राशियां और सत्‍ताइस नक्षत्र हैं, लेकिन विषय के स्‍तर पर जातक कुण्‍डली के कारकत्‍व और मंडेन ज्‍योतिष के कारकत्‍व अलग अलग होते हैं।

नए बने देशों की कुण्‍डलियां भी आज तक नहीं बनी हैं, जो बनी हैं, वे बहुत स्‍थूल रूप से केवल राशियों को आधारित कर बनाई गई हैं। हम भारत की ही कुण्‍डली की बात करें तो वह कुण्‍डली अधिकांश भारतीय उपमहाद्वीप में विभाजन से बने एक देश की आजादी की घोषणा की कुण्‍डली है, न कि भारतवर्ष की।

मंडेन ज्‍योतिष का अधिकांश काम पुरानी ज्‍योतिष की पुस्‍तकों (Astrology Books) में वर्षा, जल और सूखे से संबंधित ही मिलता है। कुछ योग भूकंप और तूफान के भी मिल जाते हैं, लेकिन ये सभी घटनाएं क्षणिक या कहें तत्‍काल परिणाम देने वाली हैं, लंबे समय तक चलने वाली नहीं। ऐसे में खगोलीय पिण्‍डों के विचरण से महामारी की चाल का पता लगाना दूर की कौड़ी है।

कोरोना महामारी और ग्रहों का गोचर (Corona and Planetary Transits)

कोरोना महामारी के लिए जिम्‍मेदार वायरस के बारे में सूचनाएं 23 अगस्‍त 2019 से ही आने लगी थीं, लेकिन तब सूचनाएं अपुष्‍ट थीं, विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने पहली बार आधिकारिक रूप से 31 दिसम्‍बर 2019 को इसे रिपोर्ट किया। उस दिन चंद्रमा शतभिषा नक्षत्र में था और मिथुन के राहू के ठीक सातवें घर में सूर्य, बुध, गुरू, केतू और शनि ग्रह एक ही भाव यानी धनु में आए हुए थे। जैसा कि हम जानते हैं कि मिथुन राशि श्‍वसन तंत्र से संबंधित है, लेकिन यहां पर राहू को आए नौ महीने से अधिक समय हो चुका था और शेष उक्‍त ग्रह राहू पर दृष्टि डाल रहे थे।

इसके बाद कोविड 19 के कारण फैल रही कोरोना महामारी को अंतरराष्‍ट्रीय संकट घोषित करने में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन को एक महीना लग गया। 30 जनवरी 2020 को इसे अंतरराष्‍ट्रीय समस्‍या घोषित किया गया। तब राहू मिथुन में ही था और उस पर गुरू और केतू की दृष्टि थी, सूर्य, बुध और शनि आगे मकर राशि में निकल चुके थे।

यहां अगर हम सूर्य और बुध की राहू पर दृष्टि को दोषी मानें तो 30 जनवरी तक यह दृष्टि हट चुकी थी। ऐसे में गोचर के ग्रहों की चाल से कोरोना की चाल को समझना टेढ़ा काम है।

अधूरी और अपुष्‍ट सूचनाओं का जाल

भले ही आज करने को सूचना क्रांति हो चुकी हो, लेकिन बेलाग ज्‍योतिषीय विश्‍लेषण करने के लिए जरूरी सूचनाएं हमारे पास नहीं है। चीन के वुहान में कोरोना का कहर शुरू होता है और अपने शुरूआती दौर में ही यूरोप और अमरीका पहुंच जाता है और बीच में पड़ रहे चीनी शहर गोंजाऊ और शंघाई को नजरअंदाज कर देता है। इसके दो कारण हो सकते हैं, या तो चीनी लोगों में महामारी को फैलाने और उससे बचने के दोनों रास्‍ते हैं अथवा हमारे पास पूरी सूचनाएं नहीं हैं। इसी दौर में सामानान्‍तर स्रोतों ने बताया कि चीनी टेलीकॉम कंपनियों के एक करोड़ से अधिक फोन ने इस अवधि में काम करना बंद कर दिया है। इससे कयास लगाया गया कि चीन ने महामारी से हुई क्षति को छिपाया है।

दूसरी ओर ऐसे देश भी हैं जहां जांच की पर्याप्‍त सुविधाएं भी उपलब्‍ध नहीं है, ऐसे में अगर बीमारी फैल रही है और उससे मरने वालों की संख्‍या संक्रमितों की तुलना में 5 प्रतिशत है, तो कभी पता नहीं चल पाएगा कि मरीज वास्‍तव में किस बीमारी से मरा है, क्‍योंकि बहुत से अविकसित और विकासशील देशों में कोरोना से होने वाली मौतों की तुलना में कहीं अधिक मौतें मलेरिया या हैपेटाइटिस से भी हो जाती हैं।

सही और सटीक सैंपल के अभाव में ज्‍योतिषी उपलब्‍ध आंकड़ों को लेकर ज्‍योतिषीय गणनाएं भी नहीं कर सकते।

कारकत्‍व का निर्धारण (Planetary Significators)

ज्‍योतिष का कोई भी प्रश्‍न अपने आप में एक सूत्र की तरह होता है। सूत्र के अवयवों के रूप में प्रश्‍न से जुड़े कारकों का ग्रहों के साथ कारकत्‍व निर्धारित किया जाता है। मसलन रोग के लिए छठा भाव, हृदय रोग के लिए सूर्य और छठा भाव (Sun in Sixth House), रक्‍त संबंधी विकार के लिए मंगल और छठा भाव (Mars in Sixth House) … यह केवल रोग के संबंध में रोग के प्रसार के लिए भावात भाव सिद्धांत से छठे का चतुर्थ यानी नवम भाव देखा जाएगा। नवम भाव और छठे भाव के साथ रोग कारक का संबंध स्‍थापित किया जाएगा।

प्रथम दृष्‍टया यह श्‍वसन तंत्र संबंधी रोग है। यानी छठे भाव के साथ बुध और मिथुन राशि भी कारकत्‍व में भूमिका निभाएंगे। इस रोग का पूरा नाम एक्‍यूट रेस्पिरेटरी डिस्‍ट्रेस सिंड्रोम (Acute Respiratory Distress Syndrome) है, यह नाक और मुंह से होते हुए श्‍वसन नलिका और अंतत: फेफड़ों तक फैलता है। तकनीकी रूप से देखा जाए तो ज्‍योतिषीय कोण से जुकाम और कोविड 19 में कोई अंतर नहीं है। मेडिकल स्‍तर पर अंतर यह है कि अधिकांश मनुष्‍यों का शरीर जुकाम के राइनोवायरस के प्रति इम्‍यून हो चुका है, लेकिन कोविड 19 के प्रति नहीं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि शरीर का प्रतिरोधक तंत्र इस लड़ाई में पूरी ताकत से कूद पड़ता है। वायरस और प्रतिरक्षा तंत्र की लड़ाई में साइटोकाइन स्‍टार्म आता है और शरीर उस लड़ाई के तूफान को झेल नहीं पाता और जातक वेंटिलेटर तक पहुंच जाता है, जहां से उसका लौटना बहुत मुश्किल होता है।

यहां तक प्राथमिक सूचनाओं के आधार पर हम देख रहे हैं, लेकिन बहुत से मामलों में इस रोग का प्रभाव शरीर के अन्‍य अंगों जैसे लीवर और किडनी तक पर पड़ रहा है। ऐसे में केवल मिथुन राशि, केवल छठा भाव, केवल बुध को लेकर फलादेश नहीं किए जा सकते।

कोरोना काल में ज्‍योतिषी क्‍या मदद करे?? (Corona and Vedic Astrology)

भले ही कोरोना महामारी के बारे में ज्‍योतिषीय कोण (Astrological Prediction for Corona) से स्‍पष्‍ट घोषणाएं नहीं की जा सकती, लेकिन जातक की व्‍यक्तिगत कुण्‍डली में देखा जा सकता है कि मारकेश का योग बन रहा है या नहीं। सौ मरीजों में से 3 या 4 मरीजों पर मृत्‍यु का संकट होता है। ज्‍योतिषीय कोण से यह देखा जा सकता है कि जातक के रोग का योग बन रहा है या मृत्‍यु का। पिछले तीन महीने में बीस से अधिक कुण्‍डलियां ऐसी आई हैं जिनमें रोग के लक्षण थे, लेकिन मृत्‍यु के नहीं। अब यह फलादेश करना अपेक्षाकृत आसान है कि जातक के परिजनों को चिंतित होना चाहिए या नहीं। पूरी महामारी का फलादेश नहीं करके व्‍यक्तिगत कुण्‍डलियों से स्थिति का अधिक स्‍पष्‍ट आकलन किया जा सकता है। जब तक मंडेन ज्‍योतिष, नए विषयों और स्थितियों के साथ ज्‍योतिष के कारत्‍व पर शोध और अध्‍ययन संस्‍थागत स्‍तर पर शुरू नहीं होता, तब तक ज्‍योतिषियों के हाथ में यही एक औजार शेष है।