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ग्रहों की चाल को बदल सकता है ध्यान - Meditation Can Transform Your Destiny
ग्रहों की चाल को बदल सकता है ध्यान - Meditation Can Transform Your Destiny

ग्रहों की चाल को बदल सकता है ध्‍यान
(Meditation Can Transform Your Destiny)

ईश्‍वर ने हमें कितनी स्‍वतंत्रता दी है, इसका कोई निश्चित मापदण्‍ड नहीं है। ज्‍योतिष के मूल में यही सिद्धांत है कि जो कुछ घटित हो रहा है, वह सबकुछ पूर्वनिर्धारित है। जिस प्रकार फर्श पर गिरा पानी ढलते हुए नाली तक पहुंचता है, अब नाली तक उस पानी के पहुंचने की धारा एक हो सकती है, दो हो सकती है, सैकड़ों हो सकती अथवा धारा दिशा बदल बदलकर नाली तक पहुंच सकती है। पानी का गिरना निर्धारित है और नाली तक पहुंचना निर्धारित है, इसके बीच की सभी अवस्‍थाएं स्‍वतंत्र की श्रेणी में आ सकती हैं।

यह धारा किस प्रकार गति करेगी, यह फलादेश ज्‍योतिषी अपनी सहज बुद्धि, अंतर्ज्ञान और ज्‍योतिषीय  ज्ञान के बूते पर करने का प्रयास करता है।

किसी भी जातक के जीवन को ग्रह कभी प्रभावित नहीं करते। जातक के जीवन को उसके कर्म ही प्रभावित करते हैं। दर्शनशास्‍त्र के अनुसार कर्म तीन प्रकार के होते हैं, संचित कर्म जो कि हमारे सभी पूर्वजन्‍मों के कर्मों का संचय है, प्रारब्‍ध कर्म जो हमें इस जन्‍म में भोगने के लिए मिले कर्म हैं और क्रियमाण कर्म जो हमें इस जन्‍म में करने हैं वे कर्म। जातक जो जीवन जीता है वह इन्‍हीं कर्मों के बीच रहता है। ग्रहों की चाल से जातक के प्रारब्‍ध और इस जन्‍म के कर्मों की संभावनाओं से भाग्‍य देखने का प्रयास होता है।

जब यह कहा जाता है कि शनि की बाधा है, तो यहां शनि किसी प्रकार की बाधा नहीं दे रहा है, शनि यह इंगित कर रहा है कि पूर्वजन्‍म के किसी कर्म के कारण, इस जन्‍म में अमुक प्रकार की बाधा आ सकती है, जब कहा जाता है कि राहु की समस्‍या है तो वह राहू द्वारा पैदा की गई समस्‍या नहीं होती, बल्कि पूर्वजन्‍म के कर्म और प्रारब्‍ध में मिले कर्म के अनुसार इस जन्‍म में भोगने वाले कर्म की गति है, जिसका राहु की स्थिति से आकलन किया जा रहा है।

ज्‍योतिष की सभी गणनाएं और फलादेश जातक के सांसारिक  जीवन से ही संबंधित होते हैं। ज्‍योतिष से पूर्वजन्‍म देखने का प्रयास किया जा सकता है, या कहें कि कुछ सिद्धांतों के आधार पर ग्रहों की बाधा का कारण पूर्वजन्‍म के किसी कर्म पर आधारित बता दिया जाता है, लेकिन उससे पूर्वजन्‍म न तो देखा जा सकता है, न बदला जा सकता है। जो कुछ घटित हुआ है, इसी जन्‍म में घटित हुआ है और आगे जो भी होना है, वह इसी जन्‍म में होगा।

अगर भावों की बात की जाए तो लग्‍न (First House) शरीर को, द्वितीय (Second House) भाव धन को, तृतीय (Third House) भाव भाई को, चतुर्थ (Fourth House) भाव माता को, पंचम (Fifth House) भाव संतान को, षष्‍ठम (Sixth House) भाव शत्रु को, सप्‍तम (Seventh House) भाव पत्‍नी को, अष्‍टम (Eighth House) भाव आयु को, नवम भाव (Ninth House) भाग्‍य को, दशम भाव (Tenth House) कर्म को, एकादश भाव (Eleventh House) आय और द्वादश भाव (Twelfth House) व्‍यय को प्रदर्शित करता है। इसमें कहीं भी अधिभौतिक कनेक्‍शन या संभावनाएं नहीं दिखाई देती हैं। ज्‍योतिष के अधिकांश कारक सांसारिक कार्य कारण संबंध और साधनों का ही प्रतिनिधित्‍व  करते हैं।

जैसे ही हम बात करते हैं साधना की, तो हम वास्‍तव में ज्‍योतिष से परे चले जाते हैं। सांसारिक कार्य कारण संबंधों से परे हमें ऐसा सूत्र हाथ लगता है जो कि हमें इस बंधन से मुक्‍त कर सकता है। साधक का प्रयास जितना तीव्र होगा, बंधन से मुक्ति भी उतनी ही तीव्र होगी। एक ओर जहां तंत्र इस बंधन से मुक्‍त होने में सहायक है तो दूसरी ओर योग।

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र की व्‍याख्‍या शुरू करने के साथ ही कहा है “योगश्चित वृत्ति निरोधः” यानी चित की वृत्तियों का निरोध ही योग है। सांसारिक साधनों से जोड़ने वाली चित की वृत्तियों का योग की शुरूआत में ही निरोध कर दिया गया है। योग के आठ अंग बताए गए हैं, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्‍याहार, धारणा, ध्‍यान और समाधि।

इनमें से यम और नियम योग के लिए साधक को तैयार करने की विधि है, आसन देह की स्थिरता के लिए जरूरी है, प्राणायाम श्‍वास को स्थिर करने के लिए आवश्‍यक है, प्रत्‍याहार से आत्‍मा और मन पर वजन कम होगा, इसके बाद किसी एक संकल्‍प की धारणा करनी होगी, उस धारणा को स्थिर करने पर ध्‍यान होगा।

ध्‍यान से पूर्व की सभी विधियों को छोटा बड़ा किया जा सकता है, लेकिन ध्‍यान अपने आप में एक गहन पद्धति है। स्‍वामी विवेकानन्‍द  ने अनुलोम-विलोम प्राणायाम के जरिए निर्विकल्‍प ध्‍यान को राजयोग बताया है। यानी हमें किसी विषय, वस्‍तु और देवता तक का ध्‍यान नहीं करना, बस जैसा है वैसा ही ध्‍यान करना है।

ध्‍यान की सैकड़ों विधियां हैं, हर जातक अपने लिए विशिष्‍ट प्रकार का ध्‍यान चुन सकता है। ओशो के लिए विपश्‍यना प्रिय थी तो विवेकानन्‍द के लिए निर्विकल्‍प ध्‍यान। बौद्ध तंत्र के अपने ध्‍यान के तरीके हैं और जैन तंत्र के अपने। सनातनी  ध्‍यान की पद्धतियां तो सैकड़ों की संख्‍या में हैं। एक सामान्‍य योग गुरू आपको ध्‍यान के लिए दीक्षित कर सकता है।

एक बार ध्‍यान की प्रक्रिया शुरू हो जाए तो मैं एक ज्‍योतिषी के रूप में अपने अनुभव के साथ कह सकता हूं कि ध्‍यान आपको ग्रहों द्वारा बताए गए परिणाम से दूर ले जा सकता है। दूसरे शब्‍दों में कर्म बंधनों को काटने में ध्‍यान की महत्‍वपूर्ण भूमिका है।

यहां मैं एक उदाहरण के साथ अपनी बात समाप्‍त करना चाहूंगा, मेरा एक जातक विदेश में रहता है। मैं जातक की पहचान गुप्‍त रखना चाहता हूं, इस कारण उसका नाम और स्‍थान आदि के बारे में जानकारी नहीं दूंगा। उस धनु लग्‍न के जातक की कुण्‍डली में 2004 में शुक्र की महादशा शुरू हुई। धनु लग्‍न में अगर शुक्र हो तो जातक शुक्र की महादशा के दौरान अधिकांशत: रोगी रहता है।

मैंने पहली बार कुण्‍डली देखी तो पहला सवाल यही किया कि वर्तमान में आप कौनसी बीमारी से जूझ रहे हैं। जब मैं जातक की कुण्‍डली 2016 में देख रहा था, तो तय था कि पिछले 12 साल से वह बीमारियों से जूझ रहा है। जातक ने बताया कि 2004 में पहली बार वह ब्रेन हाइपर एक्टिविटी की बीमारी से पीडि़त हुआ। काफी समय तक उसे झेलता रहा। आखिर में 2010 में बीमारी का इलाज कराने के लिए अमरीका गया, वहां पर चिकित्‍सकों ने तय तौर पर कुछ करने से मना कर दिया तो जातक ने इंग्‍लैंड में 2011 में ऑपरेशन कराया। परिणाम यह हुआ कि हाइपर एक्टिविटी खत्‍म हो गई साथ ही सामान्‍य दिमागी क्रियाएं भी शून्‍य के करीब आ गई। दैनिक जीवन के सामान्‍य काम काज तक करना मुश्किल हो गया। चिकित्‍सक ने लेजर से दिमाग के उस हिस्‍से को जला दिया था, जिस हिस्‍से से हाइपरएक्टिविटी हो रही थी।

अंतरराष्‍ट्रीय शेयर बाजार में चीते की चाल से चलने वाला और कुछ सौ डॉलर से मल्‍टी मिलियेनर बना बंदा 2011 से 2016 तक अपने पुराने शेयर बेचकर ही खा रहा था और जीवन के दिन कम होते देख रहा था।

मैंने उसे स्‍पष्‍ट बताया कि शुक्र की महादशा 2024 तक चलने वाली है, तब तक ऐसी ही स्थिति रहेगी। दिमाग का जो हिस्‍सा चिकित्‍सक ने जला दिया है, उसे तो संभवत: पूरित नहीं किया जा सकता, लेकिन 2024 के बाद जातक का जीवन फिर से पटरी पर आ जाएगा। मैंने कुछ उपचार बताए, जातक ने कुछ दिन उपचार किए फिर करने बंद कर दिए। मैंने भी बाद में वापस ध्‍यान नहीं दिया।

इसके कुछ महीने बाद एक दिन अचानक जातक का फिर से फोन आता है। उसने पूछा क्‍या ध्‍यान करने से उसकी हालत में सुधार हो सकता है, मैंने तुरंत कहा हां, हो सकता है। जातक ने दोबारा पूछा कि क्‍या शुक्र की महादशा के बावजूद उसकी स्थिति में सुधार हो सकता है, मैंने बिना हिचके कहा कि हां, शुक्र की महादशा के बावजूद आपकी स्थिति में सुधार हो सकता है।

दरअसल जातक ने यूट्यूब पर एक वीडियो देखा था, जिसमें एक बौद्ध भिक्षुक को अपनी गैंगरीन से नष्‍ट हो चुकी टांग को पुन: हासिल करने के बारे में बताया गया था। (यही है वह वीडियो जिसका लिंक जातक ने मुझे दिया)

इसे देखकर जातक को लगा था कि वह भी खुद को ठीक कर सकता है। जातक ने रोजाना तीन से चार घंटे ध्‍यान करना शुरू कर दिया। मात्र पांच महीने ध्‍यान करने के बाद इंग्‍लैंड में उसका रूटीन टैस्‍ट होना था। टैस्‍ट में एक कमाल की चीज उभरकर आई। सीटी स्‍कैन के दौरान ब्रेन सर्जन को वह दो छिद्र नहीं दिखाई दिए जो उसने कुछ साल पहले लेजर से जला दिए थे। सालभर पहले तक वे छिद्र ज्‍यों के त्‍यों थे, लेकिन पांच महीने के ध्‍यान (Meditation) ने उन छिद्रों को भर दिया था। ब्रेन सर्जन हैरान था, लेकिन हमारे जातक ने उसे कुछ नहीं बताया कि वे किस प्रकार भरे।

ग्रहों की चाल को बदल सकता है ध्यान - Meditation Can Transform Your Destiny
लाल घेरे मे वो 2 छिद्र दिखाई दे रहें हैं, जो ब्रेन सर्जन द्वारा कोशिकाओं को लेजर से जलाने से हुये थे

जातक फिर से अपने पुराने काम पर लौट आया और फिर से कमाई शुरू हो गई। लेकिन कुछ ही महीने बाद आंतों में फंगस की बीमारी ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया। अब जातक दिमागी तौर पर सही था, इस बार शुक्र ने न्‍यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर के बजाय आंतों में फंगल डिसऑर्डर दे दिया था। अब जातक का खाना पीना बहुत हद तक कम हो गया। हालांकि पहले की तुलना में जातक ठीक था, लेकिन बीमारी अब भी बनी हुई थी।

ग्रहों की चाल ने जातक को निष्क्रिय कर दिया था, लेकिन ध्‍यान के जरिए जातक फिर से सक्रिय हो गया और काम पर पहुंच गया, ग्रहों का असर अब भी उस पर है, लेकिन दिशा बदल गई। अभी फिलहाल जातक जातक अपनी आंतों की फंगस से लड़ रहा है, अब उसने ध्‍यान करना बंद कर दिया है, मेडिकल ट्रीटमेंट पर पूरी तरह निर्भर है, आंतों की फंगस कभी कम होती है, कभी बढ़ जाती है। कुछ दिन पहले उससे बात हुई तो उसने फिर से ध्‍यान करने का संकल्‍प किया है, लेकिन चूंकि पहले की तरह अब उतनी पीड़ा नहीं है, सो पहले की तरह ध्‍यान भी नहीं कर पा रहा है।


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