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शासक ग्रह : आंख खोल देने वाली कृष्णमूर्ति पद्धति | Ruling Planet according to Krishnamurthi Paddhati
शासक ग्रह : आंख खोल देने वाली कृष्णमूर्ति पद्धति | Ruling Planet according to Krishnamurthi Paddhati

शासक ग्रह : आंख खोल देने वाली कृष्णमूर्ति पद्धति
Ruling Planet according to Krishnamurti Paddhati


मेरे एक मित्र यह जानना चाहते थे कि उनकी पत्नी जो कि अपने भाई और भतीजों के साथ तीर्थयात्रा गई थीं, कब वापस आएँगी। वहां पर बातचीत का कोई जरिया नहीं था और वह बहुत परेशान हो रहे थे। वह उनके वापस आने की वास्तविक तारीख जानना चाहते थे। कृष्णमूर्ति पद्धति शासक ग्रहों (Ruling Planet) पर तब ज्यादा प्रभाव डालती है, जब गंभीर मुद्दों पर निर्णय लेना हो।

इस पद्धति के अनुसार यह ग्रह परिणाम की प्रवृति तथा उस घटना के फलित होने का समय बताती है। इसलिए मैंने निर्णय के समय सभी ग्रह लिख लिए, जो उस समय शासन कर रहे थे।

निर्णय की तारीख-15 फरवरी 1972
निर्णय का समय-7:43 शाम
निर्णय का स्थान-मातर, गुजरात
Latitude 22:45 North, Longitude 72:40 East

 

निम्नलिखित शासक ग्रह हैं

दिन स्वामी – मंगलवार (मंगल)
चन्द्र राशि स्वामी – कुम्भ (शनि)
चन्द्र नक्षत्र स्वामी – शतभिषा (राहू)
लग्न स्वामी – सिंह (सूर्य)
लग्न नक्षत्र स्वामी – पूर्वाफाल्गुनी (शुक्र)

सभी ग्रह सीधी चाल से चल रहे हैं और सभी ग्रहों के नक्षत्र स्वामी भी सीधी गति में हैं। जैसा कि घटना कुछ दिनों में ही घटित होने वाली थी, इसलिए हमने चन्द्र को लिया. विचार करते समय चन्द्र कुम्भ राशि में 10-4-30 डिग्री में और राहू के नक्षत्र में गोचर कर रहा था. निर्णय का समय 15 फरवरी 1972 की रात का था और मेरे मित्र की पत्नी के घर आने की उस समय कोई सम्भावना नहीं थी. मैंने एफिमेरिस उठाया और चन्द्र के गोचर को देखा, ताकि मैं एक दिन सुनिश्चित कर सकूँ कि कब उनकी पत्नी वापस आयेंगी।

16 फरवरी 1972 बुधवार को चंद्र कुम्भ राशि तथा राहु के नक्षत्र शतभिषा में गोचर कर रहा था. शतभिषा नक्षत्र 11 बजकर 55 मिनट तक था. राहु का नक्षत्र फलित है, परन्तु चंद्र, शनि की राशि में गोचर कर रहा था तो शनि अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप घटना घटित होने में विलंब कराएगा और फिर बुध भी शासक ग्रहों में नहीं है. 11 बजकर 55 मिनट के बाद चंद्र, गुरु द्वारा शासित पूर्वभाद्र नक्षत्र में गोचर कर रहा है. गुरु शासक ग्रहों में नहीं है।  अगले दिन 17 फरवरी गुरूवार हितकारी नहीं था. चंद्र मीन राशि में गोचर कर रहा है, जिसका स्वामी गुरु है और वो शासक ग्रहों में नहीं है. 9 बजकर 53 मिनट के बाद उत्तरभाद्र नक्षत्र आता है. गुरु जो कि शासक ग्रहों में नहीं है, इसलिए इस दिन घटना के फलित होने की कोई सम्भावना नहीं थी।

मैंने आगे और जांच की. 18 फरवरी शुक्रवार को जो कि शुक्र द्वारा शासित है, चंद्र मीन राशि के रेवती नक्षत्र में गोचर कर रहा था, राशि स्वामी गुरु और नक्षत्र स्वामी बुध दोनों ही शासक ग्रहों में नहीं थे. इसलिए मैंने उन दोनों दिनों को भी नहीं लिया.

19 फरवरी को शनिवार था, जिसका स्वामी शनि था. इस दिन को चन्द्र मेष राशि में गोचर कर रहा था. लेकिन सिर्फ सुबह के 3 बजकर 46 मिनट तक. 20 फरवरी 1972 को चन्द्र केतू के अश्विनी नक्षत्र में गोचर करेगा. शनि और मंगल शासक ग्रहों में हैं.

आगे 20 फरवरी को चन्द्र, शुक्र द्वारा शासित भरणी नक्षत्र में गोचर करता है. इस दिन रविवार है. इस दिन के शासक ग्रह हैं-सूर्य, शुक्र और मंगल. जो कि शासक ग्रहों में भी हैं. 20 फरवरी को चन्द्र मंगल की राशि शुक्र के नक्षत्र और राहू के उप में गोचर कर रहा है. यही वो समय है, जब वह यात्रा करके वापस घर आयेंगी. चन्द्र राहू के उप में दोपहर 12 बजे से लेकर 3 बजकर 20 मिनट तक था. तो उनकी वापसी इसी समय हो सकती थी. अब मैंने अपने मित्र को उसी के अनुसार बता दिया।

कृष्णमूर्ति पद्धति के अनुसार शासक ग्रह (Ruling Planet according to Krishnamurti Paddhati)
कृष्णमूर्ति पद्धति के अनुसार शासक ग्रह (Ruling Planet according to Krishnamurti Paddhati)

दरअसल मेरे मित्र की पत्नी दोपहर के 2 बजकर 1 मिनट पर घर वापस आयीं, जब लग्न में राहू का नक्षत्र और उप मिथुन राशि में थे. यह जानना रोचक है कि निर्णय के समय लग्न में सूर्य की राशि सिंह शुक्र का नक्षत्र पूर्वाफाल्गुनी और राहू का उप था. 20 फरवरी को दोपहर 2 बजकर 1 मिनट पर जब वह घर आईं, तब चन्द्र मंगल की राशि शुक्र के नक्षत्र और राहू के उप में गोचर कर रहा था. चन्द्र का उस दिन गोचर करना निर्णय के समय लग्न की स्थिति के द्रष्टिकोण से मिलता जुलता था. और सही ढंग से चन्द्र उन्हीं ग्रहों के नक्षत्र और उप में गोचर कर रहा था, जो कि निर्णय के समय भी शासक ग्रह थे. दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि सूर्य अपने गोचर के समय शनि की राशि कुम्भ, राहू के नक्षत्र और राहू के ही उप में था. (15 और 16 फरवरी को चन्द्र उसी स्थिति में गोचर कर रहा था. लेकिन घटना विलम्बित हुई, क्यूंकि शनि शासक ग्रहों में था और फिर जैसे ही सूर्य चन्द्र की जगह आया, वैसे ही घटना घटित हुई.) यानि कि शनि अपने गोचर के समय उनके वापस आने की शुभ घड़ी में था. उस समय लग्न में 7 डिग्री की मिथुन राशि जिसका शासन नक्षत्र और उप स्वामी राहू कर रहा था।

मेरी तरह कई और ज्योतिषी भी इस विधि को सही तरीके से अपनाने पर बिलकुल सटीक जवाब पाकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं. स्वर्गीय गुरु जी द्वारा इस सिद्धांत की प्रस्तुति वाकई में चमत्कारिक है और उन सभी की आँखें खोल सकती है, जो ज्योतिष जैसे विज्ञान की सच्चाई को जानने के लिए लालायित होकर अंधेरों की ओर बढ़ चलते हैं।

प्रस्‍तुतकर्ता – विट्ठल भाई पटेल बी.ए.

  केपी एस्‍ट्रो साइंस मैग्‍जीन अंक – 10, लेख – 6

यह लेख पूज्य गुरुजी श्री के एस कृष्णमूर्ति जी की संपादित पत्रिका एस्ट्रोलॉजी एंड अथरिष्ट से लिया गया है, यह सन 1972 के किसी माह के अंक में प्रकाशित हुआ था. इंग्लिश में प्रकाशित पत्रिका में इस लेख का शीर्षक था – KRISHNAMURTI PADDHATI AN EYE OPENER
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ज्‍योतिषी सिद्धार्थ जगन्‍नाथ जोशी भारत के शीर्ष ज्‍योतिषियों में से एक हैं। मूलत: पाराशर ज्‍योतिष और कृष्‍णामूर्ति पद्धति के जरिए फलादेश देते हैं। आमजन को समझ आ सकने वाले सरल अंदाज में लिखे ज्योतिषीय लेखों का संग्रह ज्‍योतिष दर्शन पुस्‍तक के रूप में आ चुका है। मोबाइल नम्‍बर 09413156400 (प्रतिदिन दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक उपलब्‍ध)