Home Vedic Jyotish (वैदिक ज्योतिष) पितृ दोष कुंडली में नहीं होता है। Pitra Dosha in Horoscope

पितृ दोष कुंडली में नहीं होता है। Pitra Dosha in Horoscope

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पितृ दोष कुंडली में नहीं होता है। pitra dosha in horoscope.
पितृ दोष कुंडली में नहीं होता है। pitra dosha in horoscope.

पितृ दोष कुंडली में नहीं होता है। Pitra Dosha in Horoscope


कालसर्प के बाद में अगर किसी ज्योतिष शब्द का सबसे ज्यादा दुरुपयोग हुआ है तो वो है पितृ दोष या पितृ ऋण का। ऐसा माना जाता है कि अगर किसी जातक की कुंडली में पितृदोष हो तो उसके सारे फल नष्ट हो जाते है ऐसा कैसे संभव है? क्या ज्योतिष में कोई भी ऐसा ग्रह है या कोई भी ऐसी सिचुएशन या कोई भी ऐसा योग है जो कि एक साथ कुंडली के सारे दोषों को उनके सारे फलों को नष्ट कर दे सारे सफल होने वाली स्थितियों को नष्ट कर दे ऐसा कभी नहीं हो सकता।इसका उपयोग किया जाता है कोई जब बिल्कुल अपने जीवन में निराश होता है और वो ज्‍योतिषी के पास रहता है तब इसका इस्‍तेमाल किया जाता है, कि अगर आपकी कुंडली में पितृदोष है तो आपकी कुंडली के सारे फल नष्ट हो गए हैं। अगर हम कर्म सिद्धान्त को मानें तो अगर अपने अपने सारे कर्म हमारे नष्ट हो चुके हैं तो हम तो मोक्ष की प्राप्ति हो जानी चाहिए लेकिन मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो रही है। क्यों नहीं हो रही है क्योंकि अभी कर्म बंधन बाकी है।

कर्म सिद्धांत के अनुसार कर्म तीन प्रकार के होते हैं, ये फिलॉसफी पार्ट है एस्ट्रोलॉजी का पार्ट नहीं है लेकिन एस्ट्रोलॉजी से जुड़ा हुआ है, फिलॉसफी के हिसाब से कर्म तीन प्रकार के होते हैं संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण।

संचित कर्म हमारी एक ऐसी वॉल्ट है जिसमें हमारे पूरे पिछले सभी जन्मों की कर्मों को वहां पर इकट्ठे किए गए है अब चाहे वो पांच जन्म हो, 25 हो या 500 जन्‍म। तो सभी जन्मों के कर्म में सद्कर्म और पाप कर्म सभी मिलाकर की वहां एक वॉल्ट है उसके अंदर संचित है उसमें कहते है संचित कर्म। इस जीवन में आपको जिन कर्मों को भोगने के लिए अलॉटमेंट हुआ है वो आपको मिलते हैं प्रारब्ध के अनुसार। ज्योतिष में कुंडली में उसको देखा जाता है पंचम भाव से।और तीसरा होता है क्रियमाण कर्म। मूलत: इस जन्म में आपको जो पत्ते मिलने थे वो पत्ते मिल चुके हैं आप उनको किस तरीके से खिलते हैं वो क्रियमाण कर्म है । इसको देखा जाता है कुंडली के दसवें भाव से और दसवें भाव को जब खर्च करेंगे तो हमें मिलेगा नवम भाव यानि भाग्य।पंचम भाव हमें बताता है की हमें क्या मिला है| दशम भाव बताता है हम क्या कर रहे हैं और उससे बनता हमारा नवम भाव यानी भाग्‍य। चूंकि पंचम का पंचम भावात भाव सिद्धांत से एक लग्न से पंचम संतान का होता है। अर्थात किसी भी भाव से उसका पंचम भाव इसका उत्‍पादन या परिणाम होता है, पंचम भाव का परिणाम नवम भाव में होगा प्रारब्ध से जो मिला है उसका परिणाम हमें नवम भाव से मिलता है और दशम भाव को खर्च करने पर नवम भाव मिलता है। इस तरीके से भाग्य बनता है।

अब प्रश्न ये है कि अगर कुंडली में पितृदोष है तो क्या हमें कुछ भी नहीं मिलेगा। नहीं, ऐसा नहीं है। पहले पितृ को समझ लेते हैं क्या होता है पितृऋण क्या होता है। पितृ वो सभी लोग हैं जिनसे कि हमें डीएनए या संस्‍कार मिले हैं। इस जन्म में हमारे डीएनए में जो सूचनाएं मिली है वो सभी हमें पितरों से मिले, पितरों से मतलब हमारे सारे पूर्वज जैसे की माता-पिता, दादा-दादी, परदादा-परदादी,नाना-नानी, परनाना-परनानी इस तरीके से अनंत पीढ़ियों तक जबसे सृष्टि हुई है जबसे हमें वो कोडिंग आगे से आगे मिलती गई है वो सभी लोग हैं जो हमारी पितृ हैं।

ऋण भी तीन तरीके के होते हैं क्योंकि संस्कार सिर्फ माता पिता से तो नहीं मिलते। तब तीन तरीके के ऋण बताए गए। देवी देवताओं ने हमारी जो रक्षा की है, देवताओं ने हमारा पोषण किया है इसलिए देवताओं का ऋण , दूसरा है ऋषि ऋण जिन्होंने हमें ज्ञान दिया है और जिन जिन्होंने ज्ञान के जो सूत्र उसको अक्षुण्ण रखा है। वह ऋषि ऋण और तीसरा पितृ ऋण।

अब पितृ ऋण तो होता है इसमें कोई दो राय नहीं है। पूरे साल के अंदर एक पितृपक्ष होता है 15 दिन का, उसमें हम उसमें पितरों का धन्यवाद अर्पित करते हैं कि आपने हमें इस स्टेज तक पहुंचाया है। हमने सभ्यता के इस सोपान तक पहुंच है तो ये पितृ ऋण और पितृ ऋण को और भी लिए पितृपक्ष के जबकि हम उनका धन्यवाद ज्ञापित करें। लेकिन कभी भी दोष नहीं होता आपके माता पिता कभी भी आपसे बदला नहीं लेते हैं कभी भी आपको नुकसान नहीं पहुंचाते हैं तो पितृ दोष कहीं नहीं होता है। अगर हम पितरों का धन्यवाद ज्ञापित करने में विफल रहते हैं तब उसे मान सकते हैं क्या हमने वो नहीं किया है तो हम कृतघ्न थे कि हमने उनसे जो मिला है उसके लिए हम उनकी अराधना नहीं कर रहे या उनका धन्यवाद ज्ञापित नहीं कर रहे हैं लेकिन ये कोई दोष नहीं पैदा करता है।

सबसे पॉपुलर थ्योरी यह है कि नवम भाव में राहु और सूर्य होने से पितृ ऋण होता है नहीं। नवम भाव में राहु और सूर्य होने से पिता को कष्ट होता है न की पूरा का पूरा पितृ ऋण हो जाता है| जब ज्योतिष में एक क्लासिकल पक्ष होता है और एक होती है उसकी दुकान। दुकानों ने तो यह स्थिति की एक ही पितृ ऋण, मात्र ऋण, भातृ ऋण सब तरीके के ऋण बना दिए। पितरों ने हमारे जो डीएनए में जो मिलाया उसका धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए और वो ऋण को चुकाने का तरीका यही है कि हम उनको धन्यवाद ज्ञापन करें और जो उपलब्ध संसाधन हैं और जो उपलब्ध सूचनाएं, जो उपलब्ध डीएनए, जो उपलब्ध संस्कार हैं उसको अगली पीढ़ी तक अगर हम सफलता पूर्वक पहुंचते हैं तो वो ऋण से उऋण हो जाते हैं।

दूसरा पॉइंट ये बताया जाता है की कुंडली के सारे फल नष्ट हो जाते हैं। मैं आपको यकीन दिला दूं कि ज्योतिष में ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है जो कुंडली के सारे के सारे फलों को नष्ट कर सके। सारे कर्म बंधनों को एकसाथ तोड़ सके। हां 12वें भाव का केतु आपको मोक्ष जरूर दिलाता है लेकिन मृत्यु पश्चात मुक्ति दिलाता है न कि जीवित रहते हुए। तो अगर आपको सभी कर्म फलों को नष्ट करना है तो आपको परम योगी बनना पड़ेगा और कोई तरीका नहीं है। बाकी आपके कर्मफल कहीं नष्ट नहीं हुए। कुंडली में कोई भी ऐसा दोष नहीं है जो कि आपके सारे फलों को नष्ट कर दे। इस मामले में आप निश्चिंत रहे कि किसी भी तरह की पितृदोष कुंडली में होता है।

मेरे एक मित्र ज्योतिषी हैं। एक दिन उनके निवास पर बैठा उनसे बात कर रहा था कि एक जातक कुण्‍डली दिखाने आया। काफी देर तक बड़ी गंभीरता से जातक की कुण्‍डली का अध्‍ययन करने के बाद उन्‍होंने जातक से कहा कि आपकी कुंडली में तो पितृदोष है और आपको अमुक पूजा करवानी पड़ेगी। वो सज्जन तैयार हुए उन्होंने मुझे पूजा की तैयारी के लिए सामानों के लिए लिखवा दिया और चले गए। अब मैंने पूछा कि आपने पितृदोष कैसे बताए। तो जवाब मिला कि कुंडली देखी कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या बताएं तो पूजा करवा देते हैं। ज्यादातर ज्योतिषी यही कर रहे हैं तो पूजा करना गलत नहीं है लेकिन पितृदोष बता कर करके और सिर्फ पूजा करने से पितृदोष कह करके एक्सटॉरशन करना ये गलत है।